पर्यावणविद सुन्दरलाल बहुगुणा का कोरोना से निधन

जनमंच टुडे/ देहरादून।
जाने माने पर्यावणविद सुन्दरलाल बहुगुणा का 93 साल की उम्र में कोरोना से निधन हो गया। वह ऋषिकेश एम्स में भर्ती थे। विश्वविख्यात पर्यावरणविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व पद्मभूषण सुंदरलाल बहुगुणा का शुक्रवार को 93 साल की उम्र में निधन हो गया। कोरोना संक्रमित व निमोनिया होने के कारण उन्हें 8 मई को एम्स ऋषिकेश में भर्ती किया गया था। एम्स में उन्हें आईसीयू में लाइफ सपोर्ट में रखा गया था। वह डायबिटीज से भी ग्रसित थे। शुक्रवार की दोपहर करीब 12 बजे उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। पदमविभूषण से सम्मानित और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म नौ जनवरी 1927 को टिहरी जिले के मरोड़ा गांव में हुआ था। उनके पिता अंबादत्त बहुगुणा टिहरी रियासत में वन अधिकारी थे। 13 साल की उम्र में श्रीदेव सुमन के संपर्क में आने के बाद उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। सुमन से प्रेरित होकर वह बाल्यावस्था में ही आजादी के आंदोलन में कूद गए । उन्होंने टिहरी रियासत के खिलाफ भी आंदोलन चलाया।वह गांधी के पक्के अनुयायी थे और जीवन का एकमात्र लक्ष्य पर्यावरण की सुरक्षा था। पर्यावरण संरक्षण के बड़े प्रतीक में शुमार सुंदरलाल बहुगुणा ने 1972 में चिपको आंदोलन को धार दी। साथ ही देश-दुनिया को वनों के संरक्षण के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप चिपको आंदोलन की गूंज समूची दुनिया में सुनाई पड़ी। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी बहुगुणा का नदियों, वनों व प्रकृति से बेहद गहरा जुड़ाव था। वह पारिस्थितिकी को सबसे बड़ी आर्थिकी मानते थे। वह उत्तराखंड में बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए छोटी-छोटी परियोजनाओं के पक्षधर थे। इसीलिए वह टिहरी बांध जैसी बड़ी परियोजनाओं के पक्षधर नहीं थे। इसे लेकर उन्होंने वृहद आंदोलन शुरू कर अलख जगाई थी। 1980 में बहुगुणा ने हिमालय की 5,000 किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने यात्रा के दौरान गांवों का दौरा किया और लोगों के बीच पर्यावरण सुरक्षा का संदेश फैलाया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट की और इंदिरा गांधी से 15 सालों तक के लिए पेड़ों के काटने पर रोक लगाने का आग्रह किया। इसके बाद पेड़ों के काटने पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई थी।