‘आपदा’ में ‘अवसर’ की संभावनाएं तलाशने लगा है भाजपा का ‘एक खेमा’

जनमंच टुडे/ रामनगर।
कॉर्बेट नेशनल पार्क से सटे खूबसूरत गांव ढिकुली के एक रिजॉर्ट में आयोजित भारतीय जनता पार्टी के तीन दिवसीय शिविर के दौरान पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिए साल के आखिर तक के कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार कर प्रदेश में समय से पूर्व विधानसभा चुनाव की संभावनाओं का पटाक्षेप कर दिया। इसके साथ ही सांसद से मुख्यमंत्री बने तीरथ सिंह रावत के विधानसभा का सदस्य न होने व ‘वर्तमान’ समय तक सदस्य न बन पाने की संभावनाओं के चलते नौ सितम्बर के बाद मुख्यमंत्री बदलाव की सुगबुगाहट को भी हवा मिलने लगी है। हालांकि मुख्यमंत्री के विधानसभा का सदस्य बनने की समय सीमा से पूर्व ही मध्यावधि चुनाव को लेकर फंसे कथित संवैधानिक पेंच की खबरों के आते ही सन्न हुई पार्टी की ओर से मोर्चा संभालते हुए प्रदेशाध्यक्ष मदन कौशिक ने इसे चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बताते हुए आयोग को समाधान निकालने का इशारा दे दिया था। तब से अभी तक कौशिक सहित पूरी पार्टी ने यही लाइन ले रखी है, लेकिन इसके बाद भी जिस प्रकार से अभी तक चुनाव आयोग की ओर से मध्यावधि चुनाव का कोई संकेत नहीं आया उससे पार्टी का एक खेमा अपनी उम्मीदों को लेकर प्रफुल्लित है। वैसे इस मामले में खुद मुख्यमंत्री सार्वजनिक तौर पर फ्रंटफुट बैटिंग करते हुए ‘कहीं से भी’ चुनाव लड़ने की हुंकार भरते हुए इस मामले में केंद्र के निर्णय की प्रतीक्षा करते हुए गेंद को जिस प्रकार केन्द्र के पाले में सरका रहें हैं उससे निकलने वाले संकेत उनके विधानसभा का सदस्य बनने के लिए आने वाले रोड़े का संकेत कर रहे हैं। जैसा कि मुख्यमंत्री के विधानसभा का सदस्य बनने के लिए होने वाले मध्यावधि चुनाव के लिए संवैधानिक नियमों की जिस प्रकार से सामान्य व्याख्या की जा रही है उस लिहाज से उनके विधानसभा का सदस्य बनने की संभावनाये न के बराबर बताई जा रही है। जिस कारण पार्टी में एक चर्चा इस संकट से उबरने के लिए तीरथ के नेतृत्व में ही समय से पूर्व ही आम चुनाव में जाने शुरू होने लगी थी। जिसे पार्टी ने दिसम्बर तक के कार्यक्रम घोषित करके एक तरह से खारिज कर दिया है। ले-देकर अब मुख्यमंत्री के सामने गंगोत्री विधायक के निधन से खाली हुई गंगोत्री विधानसभा का ही विकल्प बचा है, बशर्ते इसमें ‘सीट रिक्त होने के बाद बचे हुए कार्यकाल की समय सीमा एक वर्ष’ वाला पेंच न फंसे। यदि यहां इस पेंच का कोई तोड़ नहीं निकला तो फिर पार्टी के सामने मुख्यमंत्री को बदलने के अलावा कोई और रास्ता नहीं होगा। यह रास्ता पार्टी के लिए सहज तो नहीं ही होगा उल्टे विपक्ष के लिए भी एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल होने वाला बन जायेगा। इसी संकट में पार्टी के अंदर एक खेमा ‘आपदा में अवसर’ की संभावनाएं तलाशने लगा है। चिन्तन शिविर के समाप्त होते ही केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, राज्यसभा सांसद व राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी सहित कई नामों को लेकर कयासबाजियां शुरू हो गयी हैं। इस संकट से पार पाना पार्टी के रणनीतिकारों के लिए खासी अग्निपरीक्षा है। बहरहाल, भविष्य में कुछ भी हो लेकिन आने वाला कुछ समय राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील है, इसमें कोई संदेह नहीं।
- रामनगर से वरिष्ठ पत्रकार सलीम मलिक।