आखिर कांग्रेसियों को कब मिलेगी आपसी लड़ाई से फुर्सत

जनमंच टुडे/रामनगर।
- क्षत्रपों की आपसी लड़ाई कर रही कांग्रेस को कमजोर
“कुछ इस तरह से बिखरी पड़ी है, चादर-ए-ज़िंदगी। कि एक कोना समेटता हूँ, दूसरा फिसल जाता है।। जीवन की उलझनों को प्रदर्शित करता यह शेर वर्तमान में उत्तराखण्ड कांग्रेस के लिए मौजूं बन गया है। प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए रणभेरी बजने के बावजूद भी कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं। नेता-प्रतिपक्ष के निधन के बाद इस पद के उत्तराधिकारी चयन के समय से ही पार्टी के क्षत्रपों की निकली म्यान से तलवारें वापस म्यान में जाती नहीं दिख रहीं। नेता प्रतिपक्ष और पार्टी अध्यक्ष का लम्बे समय के बाद चयन करके पार्टी आलाकमान ने दम भी नहीं भरा कि काँग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के कार्यभार ग्रहण करने के बहाने आयोजित समारोह में ही काँग्रेस क्षत्रपों की साफ सुनाई देने वाली अलग-अलग धुन निकलने लगी। समारोह में काँग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रणजीत सिंह रावत की एक खास टिप्पणी ने पार्टी के अंदरूनी इस विवाद को बढ़ा दिया। जिसके बाद दूसरे खेमे से इसका पलटवार शुरू हो गया। “बेशक हौसले उड़ानों की बुनियाद होते हैं, लेकिन कांपते हाथों से शमशीर नही उठा करती” टिप्पणी से खेमेबाजी में बंटी काँग्रेस का रायता एक बार फिर चौराहे पर आ गया। काँग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के स्वागत समारोह में पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रणजीत सिंह रावत के मुखारविंद से निकली इन पंक्तियों की गूंज देर तक समारोह में दिलचस्पी की वजह बनी रही। वहां मौजूद हर राजनैतिक शख्स ने इसके ठीक वही निहितार्थ निकाले, जिस संदर्भ में यह टिप्पणी की गई थी। “कांपते हाथों” का संदर्भ पार्टी में किसके लिए दिया जा रहा है, यह जानना कोई बड़ी बात नहीं थी। खास तौर पर तब जबकि रावत का “कांपते हाथों” से सीधा टकराव राज्य से काँग्रेस की सत्ता की विदाई के बाद से ही चला आ रहा हो। कांग्रेस की राजनीति में पूर्व सीएम हरीश रावत और रणजीत रावत का साढ़े तीन दशक का साथ रहा। रणजीत रावत हमेशा उनके राइट हैंड की भूमिका में रहे। कोई ढकी-छुपी बात नही है कि सीएम बने हरीश रावत के समय रणजीत रावत ही सत्ता के मुख्य केंद्रबिंदु थे। 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद दोनों के बीच के सम्बन्धों में ऐसी खटास आई कि बोलचाल व दुआ सलाम तक बन्द हो चली। यह दूरियां सल्ट उपचुनाव के दौरान खाई बन गईं जब पुत्र विक्रम रावत को पार्टी ने टिकट न देकर हरीश रावत खेमे की गंगा पंचोली को चुनाव लड़ाया। बेटे का टिकट कटने के बाद रणजीत रावत ने अपने पुराने गुरु से जुड़ी कुछ खास बातें उठाकर जो राजनीतिक हमले किये थे, उन्होंने शायद दोनों के बीच भविष्य में होने वाले किसी भी समझौते की संभावनाओं को खत्म कर दिया। गोदियाल के स्वागत समारोह में भी इस शेर के बहाने रणजीत रावत ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उम्र के इस पड़ाव पर खड़े हरीश रावत “कांपते हाथों” से तलवार नही उठा सकते। बिना किसी के नाम का इस्तेमाल करने के बाद भी सब जानते हैं कि उनकी मंशा मुख्यमन्त्री के चेहरे के तौर पर स्थापित हो रहे हरीश रावत पर राजनीतिक वार करने की रही थी। हालांकि हरीश रावत ने कभी भी सीधे सामने से रणजीत रावत पर हमला नहीं किया। लेकिन उन्होंने पलटवार नहीं किया, यह सोचना भी भूल होगी। उनकी तरफ से यह मोर्चा हमेशा उनके समर्थकों की तरफ से संभाला गया। इस बार भी यही हुआ। बड़े रावत की तरफ से दो खिलाड़ियों ने बैटिंग करते हुए छोटे रावत पर हमले किये। एक हमला उनकी मातृभूमि से तो दूसरा हमला उनकी मौजूदा कर्मभूमि से हुआ। रामनगर के पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी ने सोशल मीडिया पर “कंपकंपाते हाथों से जब भी हमारी शमशीर उठी है, बगावत करने वालों के धड़ सर से अलग करके ही लौटी है, तेरे हाथों को भी कभी इन्हीं हाथों ने थामा था, नादान फिर कैसे सोच लिया तूने, इन हाथों में ताक़त की कमी है।” लिखकर देहरादून से शुरू हुए “राजनैतिक मुशायरे” में अपनी आहुति दे डाली। इसी तरह सल्ट उपचुनाव के दौरान ताज़ा-ताज़ा कांग्रेस हुए पूर्व जिला पंचायत नारायण सिंह रावत ने भी एक वीडियो जारी करते हुए रणजीत रावत पर गम्भीर आरोपों की झड़ी लगा डाली। जैसे बड़े रावत की तरफ से छोटे रावत पर कोई टिप्पणी नहीं की जाती। कमोवेश उसी का अनुशरण करते हुए छोटे रावत की ओर से इन दोनों मामलों पर कोई टिप्पणी नहीं की गई, लेकिन इसका मतलब युद्धविराम नहीं है, सही समय का इंतज़ार है। कुल मिलाकर जिस समय पार्टी को एकजुटता के साथ विधानसभा चुनाव को फतह करने की तैयारियों में जुटना चाहिए, उस समय उनके आपसी झगड़े पार्टी को तो कमजोर कर ही रहे हैं, कार्यकर्ताओं को भी हतोत्साहित कर रहें हैं।
रामनगर से वरिष्ठ पत्रकार सलीम मलिक