देवीधुरा में खेली गई पत्थरों की बग्वाल

जनमंच टुडे/ चंपावत।
चम्पावत जिले में स्थित देवीधुरा का ऐतिहासिक आषाढ़ी कौतिक के नाम से प्रसिद्ध बग्वाल मेला रक्षा बंधन के मौके पर रविवार को मनाया गया। करीब आठ मिनट तक चली। बग्वाल(युद्ध) में योद्धाओं ने फूल, फल से युद्ध किया। आखिरी के कुछ मिनट में पत्थर भी बरसे। बग्वाल युद्ध में 75 रणबांकुरे घायल हुए। आठ मिनट के इस युद्ध मे योद्धाओं में पराक्रम दिखाने का युद्ध चला। बग्वाल खेलने के बाद सभी ने आपस में गले मिलकर एक दूसरे को बधाई दी। इस दौरान पूरा क्षेत्र मां वाराही के जयकारों से गुंजायमान रहा। इस बार प्रशासन ने कोरोना के चलते बग्वाल मेले में बाहरी क्षेत्र के लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। 11 बजकर 2 मिनट पर जैसे ही बग्वाल के लिए शंखनाद हुआ वैसे ही चारों खामों (बिरादरी) के रणबांकुरों ने फलों की बग्वाल शुरू कर दी । उसके कुछ ही सेकेंड बाद पत्थर और डंडों की बग्वाल शुरू हो गई । जैसे ही 11 बजकर 10 मिनट पर पुजारी ने शंखनाद और चंवर झुलाकर बग्वाल समापन की घोषणा की। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार पौराणिक काल में चार खामों के लोगों द्बारा अपनी आराध्य मां बाराही देवी को मनाने के लिए नर बलि देने की प्रथा थी। कहा जाता है कि एक साल चमियाल खाम की एक वृद्ध परिवार की नर बलि की बारी थी। परिवार में वृद्धा और उसका पौत्र ही जीवित थे। बताया जाता है कि महिला ने अपने पौत्र की रक्षा के लिए मां बाराही की स्तुति की। मां बाराही ने वृद्धा को दर्शन दिए और चार खामों के बीच बग्वाल खेलने के आदेश दिए। तब से बग्वाल की प्रथा शुरू हुई। माना जाता है कि एक इंसान के शरीर में मौजूद खून के बराबर रक्त बहने तक खामों के मध्य पत्थरों से युद्ध यानी बग्वाल खेली जाती है। पुजारी के बग्वाल को रोकने का आदेश तक युद्ध जारी रहता है। मान्यता है कि इस खेल में कोई भी गंभीर रूप से घायल नहीं होता है।