जहां आज भी स्वयं उगती है पाण्डवों द्वारा बोई गयी धान की फसल

जनमंच टुडे/ ऊखीमठ।

वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण  के कारण चारधाम यात्रा स्थगित होने से क्षेत्र के सभी तीर्थ स्थल वीरान है, जबकि सुरम्य मखमली बुग्यालों के मध्य प्रकृति की गोद में बसे सुन्दर वादियां सैलानियों व प्रकृति प्रेमियों की आवाजाही से गुलजार हैं।  सैलानी व प्रकृति प्रेमी अपने निजी संसाधनों के सहारे मीलों पैदल चलकर प्रकृति की खूबसूरत छटा का लुत्फ उठा रहे हैं।  इन दिनों त्रियुगीनारायण – पवालीकांठा, चौमासी – खाम – मनणामाई, रासी – शीला समुद्र – मनणामाई, मदमहेश्वर – पाण्डवसेरा – नन्दी कुण्ड, बुरुवा – टिंगरी – बिसुडीताल, चोपता – ताली – रौणी – बिसुणीताल पैदल ट्रैक सैलानियों व प्रकृति प्रेमियों की आवाजाही से गुलजार हैं। वैसे तो हिमालय के आंचल में बसे हर पैदल ट्रैक व पर्यटक स्थल को प्रकृति ने अपने वैभव का भरपूर दुलार दिया है, मगर मदमहेश्वर – पाण्डव सेरा – नन्दी कुण्ड पैदल ट्रैक पर सफर करने से परम आनन्द की अनुभूति होती है।

इस पैदल ट्रैक पर प्रकृति को अति निकट से दृष्टिगोचर करने के साथ ही पाण्डवों के अस्त्र शस्त्र के दर्शन करने के साथ – साथ पाण्डव सेरा में पाण्डवों द्वारा बोई गयी धान की लहराती फसल को भी देखने का सौभाग्य मिलता है। मदमहेश्वर – पाण्डव सेरा – नन्दी कुण्ड पैदल ट्रैक से वापस लौटे छह सदस्यीय दल ने बताया कि इन दिनों मदमहेश्वर – पाण्डव सेरा – नन्दी कुण्ड पैदल ट्रैक पर कुखणी, माखुणी, जया, विजया, बह्मकमल सहित अनेक प्रजाति के पुष्पों के खिलने से ऐसा आभास हो रहा है कि जैसा वहाँ की पावन माटी ने नव श्रृंगार किया हो। दल में शामिल मनोज पटवाल ने बताया कि मदमहेश्वर – पाण्डव सेरा – नन्दी कुण्ड पैदल ट्रैक बहुत ही कठिन है, मगर इन दिनों अनेक प्रजाति के पुष्पों के खिलने से वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य पर चार चांद लगे हुए है। दल में शामिल हरिमोहन भटट् ने बताया कि इन दिनों हिमालयी क्षेत्रों में बारिश निरन्तर होने से द्वारीगाड का झरने का वेग उफान पर होने के कारण झरना बहुत खूबसूरत लग रहा है, मगर द्वारीगाड में पुल न होने से द्वारीगाड को पार करना जोखिम भरा है। दल में शामिल महावीर सिंह बिष्ट ने बताया कि लोक मान्यताओं के अनुसार जब पांचों पाण्डव द्रोपदी सहित केदारनाथ से मदमहेश्वर होते हुए बद्रीनाथ गये तो उस समय उन्होंने पाण्डव सेरा में लम्बा प्रवास किया था, इसलिए पाण्डवों के अस्त्र शस्त्र आज भी उस स्थान पर पूजे जाते हैं। संजय गुसाईं ने बताया कि पाण्डव सेरा में पाण्डवों द्वारा बोई गयी धान की फसल आज भी अपने आप उगती है, मगर उस धान की फसल देखने का सौभाग्य परम पिता परमेश्वर की ईश्वरीय शक्ति से मिलता है। अमित चौधरी ने बताया कि नन्दी कुण्ड में चौखम्बा का प्रतिबिम्ब देवरिया ताल की तर्ज पर देखा जा सकता है। नन्दी कुण्ड से सूर्य अस्त व चन्द्रमा उदय के दृश्य को ऐसा देखने के अपार आनन्द की अनुभूति होती है।

सुभाष रावत ने बताया कि मदमहेश्वर धाम से पाण्डव सेरा लगभग 14 किमी, नन्दी कुण्ड लगभग 20 किमी दूर है। इन दिनों पूरा क्षेत्र विभिन्न प्रजाति के पुष्पों से महक रहा है।

  • वरिष्ठ पत्रकार, लक्ष्मण सिंह नेगी।

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