जन्मी भी न थी कि, मार डाला जालिमों ने
एक ऐसी कहानी जिसमें नन्ही सी परी ने दुनिया में पैर भी नही रखे थे, उसे गर्भ में ही मार दिया गया क्या कसूर था उसका कि वो सिर्फ एक लड़की थी…….
माॅ में तो अभी तुम्हारे कोख से निकली न थी तुमने मुझे जालिमों के कहने पर दुनिया से अलविदा कर डाला क्या कसूर था मेंरा जो मे तुम्हारे हिदय में एक काटा बन गई थी। सब जानती हूॅ माॅ ये जालिम कैसे तुझे मुझे गिरवाने को मारा करते थे।
बात उन दिनों की है माॅ जब में तुम्हारे कोख में आई तो सारा घर कितना खुशियों से भर गया था पर जैसे ही घर वालो को भनक हुई वैसे ही तेरा दिल तो डर गया आखिर में एक लड़की को जन्म देने वाली हूॅ साथ ही साथ तेरे घर वाले भी तूझे मुझ नादान को गिरवाने को कहते रहे तो क्या तूने ये भी न सोचा की में भी माॅ बनने से पहले एक लड़की हूॅ। अगर सोचा होता न माॅ तो यू मुझे गिरवा न देती। तेरे दिल में भी रहा होगा लड़कियाॅ तो होती पराया धन है इनको पालना मतलब सिर पर बोझ रखना ।
जिस दिन तू मुझे गिरवाने अस्पताल पहुची तो तू बहुत डरी हुई थी सोच रही थी क्या पता मेरे जालिम पापा मुझ पर तरस खायेगेें, लेकिन कहा फर्क पड़ना था उनको ले गऐ सीधा क्लीनिक ओर करा दिया अबोशन माॅ जब में मर रही थी न तेरे कोख में मुझे अपने से ज्यादा दर्द सिर्फ इस बात का था कि मुझसे ज्यादा दर्द तूझे न हो रहा हो।
मरते -मरते में उन जालिमों को यह सदेंश देना चाहती हुॅ लाख मार दो तुम मुझे, लाख गिरा दो गर्भ में तुम मुझे, पर अगर आने वाले समय मे में न हुई तो कैसे चलाओगें ये पीड़ी इसका जवाब दे दो तुम मुझे?
कहानी से किसी का कोई लेना देना नहीं है, कहानी काल्पनिक है।
आरती पांडेय (लेखक )