कहां गया वो बचपन

जब हम छोटे बच्चे थे।
हां अक्ल से हम कच्चे थे।।
रास्तों मे घुमा करते थे।
हां हम छोटे बच्चे थे।।
थोड़े अक्ल के कच्चे थे।
हां अक्ल से हम कच्चे थे।।
रास्तों मे घुमा करते थे।
हां हम छोटे बच्चे थे।।
थोड़े अक्ल के कच्चे थे।
स्कूल जाने से कतराते थे।।
पेंसिल पकड़ने से डगमगाते थे।
कागज़ की कश्ती बनाते थे।।
पानी मे गोते लगाते थे।
हां हम छोटे बच्चे थे।।
पेंसिल पकड़ने से डगमगाते थे।
कागज़ की कश्ती बनाते थे।।
पानी मे गोते लगाते थे।
हां हम छोटे बच्चे थे।।
थोड़े अक्ल के कच्चे थे।।
कार्टून देखा करते थे।
पेंसिल को छिला करते थे।।
गलती हो जाने पर,
रबड़ से मिटाया करते थे।।
जब हम शैतानी करते थे।
तब चारपाई के नीचे छिप जाते थे।
हां हम छोटे बच्चे थे।।
थोड़े अक्ल के कच्चे थे।
पीटू फोड़ ,चुपम -छुपाई,
पकड़म पकड़ाई खेला करते थे ।। अपनी बारी आने को हम लड़ा करते थे।
कट्टी, अप्पा हो जाते थे।।
नए दोस्त बन जाते थे।
हां हम छोटे बच्चे थे।
थोड़े अक्ल के कच्चे थे।
जाने कब हम बड़े हो गए।
दोस्ती यारी सब छोड़ गए।।
निकल पड़े रास्तों के सफ़र में।
सारे बच्चपन घर छोड़ गए।
हां हम अब बड़े हो गए।।
अक्ल से अब पक्के हो गए।
अब हम मतलब के यार है।
अपने कामों के हकदार है।।
कभी पेंसिल से डगमगाते थे।
आज हम समझदार है।
न जाने कहां छूट गया वो
बचपन।।
लेखक(आरती पांडेय) ।