यहां की थी पांडवों ने शिव की उपासना

प्रीती नेगी।

जनमंच टुडे/देहरादून।

देवभूमि उत्तराखंड को शिव की भूमि कहा गया है। यहीं कैलाश पर शिव का वास है । आद्य शंकराचार्य के उत्तराखंड आने से पूर्व यहां शैव मत का ही बोल बाला रहा है और सभी लोग भगवान शिव के उपासक थे। आज भी शिव विभिन्न रूपों में उत्तराखंड के आराध्य देव हैं।उत्तराखंड के कण-कण में भगवान शिव साक्षात रूप से विराजमान हैं। इन्ही में से एक हैं, एकेश्वर महादेव, यानि इगासर दिपता। भगवान शिव को समर्पित यह विख्यात मंदिर उत्तराखंड के  महत्वपूर्ण सिद्धपीठों में से एक है।

 

 समुंदर तल से 1575 मीटर की ऊंचाई पर बसा एकेश्वर  बेहद रमणीय स्थानों में से एक है, यहां की हरियाली, हिमालय दर्शन, सूर्यास्त का मोहककारी दृश्य व कार्निवाल के मोहक दृश्य हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है।  दार्शनिक, धार्मिक स्थलों के साथ ही, सैर सपाटे के लिए कई पिकनिक स्पॉट के लिए एकेश्वर बेहद खूबसूरत स्थान है।  धार्मिक दृष्टि से यहां सिद्धपीठ एकेश्वर महादेव मंदिर है।  सावन और महाशिवरात्रि को श्रद्धालुओं एकेश्वर  महादेव के दर्शन को पहुँचते है।

  • शुभम करोति कल्याणम, आरोग्यम, धन, सम्पदा।। शत्रु ,बुद्धि विनाशाय,दीपज्योति नमोsस्तुते।।

एकेश्वर शैव पीठ हज़ारों साल प्राचीन है। कहा जाता है कि द्वापरयुग में  हिमालय जाते समय पांडव एकेश्वर आए थे और उन्होंने यहां की प्राकृतिक सुंदरता के बीच सकून के  पल बिताए थे और भगवान एकेश्वर की आराधना  की थी। 810 ई के आसपास, आदिगुरु शंकराचार्य एकेश्वर आए थे और उन्होंने यहां भगवान शिव की पूजा अर्चना की और मन्दिर की स्थापना की थी। मन्दिर के गर्भ गृह मेंं स्वयंभू शिवलिंग विराजमान हैं।

कहा जाता है कि सदियों पहले एकेश्वर महादेव मंदिर से बदरीनाथ मन्दिर तक सुरंग थी जो दैवीय आपदा के चलते बन्द हो गई।  पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान शिव ने ताड़कासुर का वध किया तो वह एकेश्वर के रास्ते  ताड़केश्वर गए थे। माना जाता है कि एक देवता सिद्धांत यानी भगवान शिव के शैवपीठ के चलते ही इस स्थान का नाम एकेश्वर पड़ा होगा। एकेश्वर महादेव के शिवलिंग पर जो  गंगाजल, जल ,  दूध चढ़ाया जाता है वह मन्दिर के नीचे बसे पातल गॉव के पास एक स्थान टपकता है। जिसे स्थानीय भाषा में जलहरी के नाम से जाना जाता है।  गाँव में आज भी दुधारू गाय का दूध सर्वप्रथम जलहरी को अर्पित किया जाता है। कहा जाता है कि पहले पूरे क्षेत्र में   12 बजे के बाद कोई भी किसान बैल को जोह पर नहीं रखता था, अगर कोई भूलवंश ऐसा करता था तो महादेव स्वयं बैलों को जोह से खोलने के लिए आवाज लगाते थे। इसलिए भगवान एकेश्वर महादेव को बोलता हुआ भोलेनाथ भी कहा जाता है।  गोरखाओं ने जब गढ़वाल पर आक्रमण किया था तो  गोरखा भी एकेश्वर महादेव की शरण में आए थे और उन्होंने भगवान एकेश्वर महादेव की पूजा, अर्चना की थी।

  • दिपता इगासर, दिपता, दैनु हवैजै।।
  • दुई गति बैसाख तेरा मेला उड़ी ग़ै।।

यहां 2 गते बैसाख को एकेश्वर में मेला लगता है, जिसे स्थानीय बोली में बिखोत कहा जाता है।  पहले मन्दिर और मन्दिर प्रांगण में महिलाएं अपने पति के साथ संतान के लिए रातभर दीप जलाकर खड़ी रहती थी और भगवान भोलेनाथ की स्तुति करती थी। धीरे, धीरे इस परंपरा ने मेले का रूप ले लिया। इस दिन आसपास के गांवों के लोग खेत मे उगे नए अनाज का भोग  सर्वप्रथम शिव को लगाते हैं।

मन्दिर से कुछ दूरी पर ठंडे पानी की प्राकृतिक जल धारा बहती है, जिसे स्थानीय भाषा में मंगारा कहा जाता है। कहा जाता है कि पहले मेले में जितनी अधिक भीड़ उमड़ती थी तो जलधारा का पानी बढ़ता था।

 

 

 

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