यहां रूप बदलकर भक्तों को दर्शन देती है माँ भगवती

जनमंच टुडे/ देहरादून।

देवभूमि उत्तराखण्ड के कण, कण में देवी देवताओं का वास है। अनादिकाल से यह भूमि, ऋषि मुनियों की तपस्थली रही है। श्रीनगर में मां काली को समर्पित  एक ऐसा मन्दिर है जिसे उत्तराखंड की संरक्षक, पालक देवी के साथ ही श्रद्धालुओं की रक्षक देवी माना जाता है। मान्यता है कि यहां मां धारी भक्तों को  रूप बदलकर दर्शन देती है। माता धारी भक्तों को सुबह बाल अवस्था, दिन में यौवना और  सायंकाल में वृद्ध रूप में प्रकट होकर  दर्शन देती हैं।  पौडी जनपद में बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर श्रीनगर, रुद्रप्रयाग के बीच कलियासौड़ में अलकनंदा के तट पर विराजमान धारी देवी को जनकल्याणकारी के साथ ही दक्षिणी काली माता कहा जाता है । कहा जाता है कि माता रानी की मूर्ति का ऊपरी हिस्सा सदियों पहले अलकनंदा में बहकर यहां आया था। तब से मूर्ति यही पर विराजमान हैं। जबकि मूर्ति का निचला आधा हिस्सा रुद्रप्रयाग जिले के कालीमठ में स्थित है। मंदिर में माँ काली की प्रतिमा द्वापर युग में स्थापित की गई थी। प्रचलित कथा और मान्यता के अनुसार एक रात जब भारी बारिश से अलकनंदा उफान पर थी। इसी दौरान गांव वालों को स्त्री की चीखने, चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। गाँव वाले आवाज सुनकर उस ओर दौडे। वह जब उस स्थान पर पहुँचे तो उन्हें पानी में मूर्ति तैरती दिखाई दी और आवाज भी उसी मूर्ति से आ रही थी। इसके बाद गांववासियों ने अलकनन्दा से उस मूर्ति को निकाल लिया और मूर्ति को वही स्थापित कर दिया। धारी गाँव के समीप मूर्ति स्थापित होने केे बाद यह स्थान धारी देवी के नाम से विख्यात हुआ। दूसरी प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीनकाल में किसी सौतेली मां ने अपनी बेटी की हत्या करवा दी थी, और उसके टुकड़े करके अलकनंदा में फेंक दिया था। उसके बाद उसका सिर व ऊपरी भाग अलकनंदा में बहता हुआ धारी गांव तक पहुंचा तो धुनार   ( नाविक) ने उसे निकाल कर अलकनंदा के तट पर स्थापित कर दिया। भक्तों के अनुसार माता रानी दिन में तीन बार अपना रूप बदलती है। माता सुबह  बालिका, दिन में स्त्री, और सायं को बूढ़ी औरत के रूप में दर्शन देती है । पुजारियों व स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर में माँ काली की प्रतिमा द्वापर युग से स्थापित की गई थी । कालीमठ एवं कालीस्य मठों में माँ काली की प्रतिमा क्रोध मुद्रा में होती हैं, जबकि धारी देवी में माँ काली की प्रतिमा शांत मुद्रा में है ।  दुर्गा पूजा,  चैत्र व शारदीय नवरात्र में हजारों श्रद्धालु अपनी मनौतियों लेकर दूर-दूर से यहां पहुँचते हैं।

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