प्रथम गोरखा आक्रमण का गवाह ‘लंगूरगढ़’

जनमंच टुडे। इतिहास न केवल अतीत से परिचित कराता है, बल्कि आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है। एक तरह से यह अतीत और वर्तमान के बीच का सेतु है। इतिहास विज्ञान का भी मार्गदर्शक है, इसलिए उसे भविष्य का आईना कहा गया है। मनुष्य होने के नाते हमें अपने इतिहास से अवश्य परिचित होना चाहिए। इसीलिए हमेशा मेरी कोशिश पहाड़ को अधिक से अधिक जानने की रही है। चलिए! इसी कडी़ में आपको लंगूरगढ़ (भैरवगढ़) के अतीत और वर्तमान से परिचित कराता हूं। गढ़वाल को 52 गढो़ं का देश कहा गया है। कहते हैं कि कत्यूरी शासन की समाप्ति के पश्चात गढ़वाल में बहुराजकता का काल आरंभ हुआ तो गढ़वाल क्षेत्र छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित हो गया। ऐसा माना जाता है कि तब गढ़वाल में 52 गढ़ (किले) स्थापित थे, जिनका संचालन छोटे-छोटे राजा करते थे। इन्हें गढ़पति कहा जाता था।

गढ़वाल को 52 गढो़ं का देश कहा गया है। कहते हैं कि कत्यूरी शासन की समाप्ति के बाद गढ़वाल में बहुराजकता का काल आरंभ हुआ तो गढ़वाल क्षेत्र छोटी-छोटी इकाइयों में विभाजित हो गया। ऐसा माना जाता है कि तब गढ़वाल में 52 गढ़ (किले) स्थापित थे, जिनका संचालन छोटे-छोटे राजा करते थे। जिन्हें गढ़पति कहा जाता था, लेकिन, धीरे-धीरे ये गढ़ गढ़वाल राज्य के अधीन होते चले गए। प्रसिद्ध इतिहासकार डा. शिवप्रसाद डबराल ‘चारण’ लिखते हैं कि सन 1790 में गोरखा फौज द्वारा कुमाऊं पर अधिकार कर लेने के बाद गोरखा सैनिकों का ध्यान गढ़वाल की ओर गया। तब गढ़वाल में परमार वंश का शासन था और राजा प्रद्युम्न शाह गढ़वाल के राजा थे। 1791 में हर्ष देव जोशी (हरक देव) की सहायता से गोरखों ने गढ़वाल पर चढ़ाई कर दिया। लंगूरगढ़ में दोनों सेनाओं का आमना-सामना हुआ। (लंगूरगढ़ तत्कालीन गढ़वाल राज्य की दक्षिणी सीमा पर स्थित परगना गंगा सलाण का सामरिक रूप से संवेदनशील एवं प्रमुख गढ़ हुआ करता था।) तब गोरखा सेना का नेतृत्व चंद्रवीर और भक्ति थापा कर रहे थे। यह युद्ध 28 दिनों तक चला, लेकिन अंततः प्रद्युम्न शाह की सेना ने गोरखाओं को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया। गोरखा सेना की हार हुई और उसे संधि के लिए विवश होना पडा़। 1792 में लंगूरगढ़ की संधि हुई, जिसके तहत गोरखाओं ने गढ़वाल पर कभी आक्रमण न करने का वचन दिया। साथ ही गोरखाओं पर 25 हजार रुपये वार्षिक कर भी आयद किया गया। कहते हैं कि गोरखाओं को पराजित करने के बाद सेनापति रामा खंडूडी़ ने यहां चोटी पर भैरवनाथ का पूजन किया था और अनुष्ठान के बाद सेना सहित वापस श्रीनगर लौट गए। इसके बाद गढ़वाल नरेश ने इस क्षेत्र से एकत्र होने वाले भू-राजस्व को भैरवगढी़ मंदिर में पूजा-अर्चना पर खर्च करने के निर्देश दिए। 1804 के दूसरे गोरखा हमले में लंगूरगढ़ गोरखाओं के कब्जे में चला गया। तब गोरखाओं ने यहां मंदिर की स्थापना की। क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई पौडी़ की रिपोर्ट के अनुसार यहां भैरव मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर एक मन (40 सेर या किलो) वजनी ताम्रपत्र चढा़ है। इस पर फाल्गुन संवत 1884 और देवनागरी लिपि में भक्ति थापा के नाम का उल्लेख है। कहते हैं कि गोरखाओं ने इसे अपना वर्चस्व साबित करने के लिए मंदिर में चढा़या था। मंदिर में 30 गुणा 15 सेमी माप की पंचाग्नितप हरे रंग की देवी पार्वती की पाषाण प्रतिमा भी है। शैलीगत आधार पर यह प्रतिमा दसवीं व 11वीं शताब्दी के बीच की बताई जाती है। लंगूरगढ़ समुद्रतल से 2750 मीटर की ऊंचाई पर पौडी़ गढ़वाल जिले के द्वारीखाल विकासखंड में स्थित भैरवगढ़ गढ़वाल के 52 गढो़ं में से एक है। इसका वास्तविक नाम लंगूरगढ़ है।संभवत: लांगूल पर्वत पर स्थित होने के कारण इसे लंगूरगढ़ कहा गया। लांगूल पर्वत की आमने-सामने स्थित चोटियों पर दो किले (गढ़) हैं, जिनमें एक का नाम लंगूरगढ़ और दूसरे का भैरवगढ़ है। लंगूरगढ़ को हनुमानगढ़ और भैरवगढ़ को भैरवगढी़ भी कहा जाता है। इन चोटियों तक पहुंचने के रास्ते भी अलग-अलग हैं, बावजूद इसके दोनों गढ़ को एक ही माना गया है। भैरवगढ़ जाने के लिए पहले गढ़वाल के प्रवेशद्वार कोटद्वार पहुंचना पड़ता है। कोटद्वार से 36 किमी की दूरी पर गुमखाल और यहां से ऋषिकेश रोड पर चार किमी आगे कीर्तिखाल़ (केतुखाल़) पड़ता है। यहां से लंगूरगढ़ पहुंचने के लिए ढाई की खडी़ चढा़ई पैदल तय करनी पड़ती है। कीर्तिखाल ऋषिकेश और कोटद्वार से सीधे पहुंचा जा सकता है। जबकि, गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर एवं छावनी शहर लैंसडौन से भैरवगढ़ की दूरी राजखिल गांव होते हुए लगभग 17 किमी है। आपको अगर भैरवगढ़ से लंगूरगढ़ जाना है तो इस चोटी से आधा किमी नीचे उतरना पडे़गा। यहां घास के एक छोटे से मैदान (बुग्याल) से कच्चा रास्ता दाहिनी ओर जाता है। इस पर कुछ दूर तक उतराई के बाद फिर चढा़ई शुरू हो जाती है। यह चढा़ई आपको सीधे इसी पर्वत की दूसरी चोटी यानी लंगूरगढ़ पहुंचा देगी। यहां से नीचे उतरने के भी दो रास्ते हैं। पहला वापस घास के मैदान से होते हुए सीधे कीर्तिखाल पहुंचाता है। जबकि, दूसरा रास्ता भैरवगढी़ से थोडा़ नीचे आने के बाद दाहिनी ओर पगडंडी के रूप में है। बाहर से आने वाले लोग इस टेढे़-मेढे़ रास्ते का कम ही उपयोग करते हैं। भगवान शिव के 15 अवतारों में से एक नाम भैरव का आता है, उसी भैरव रूप को समर्पित है, भैरवगढ़ की चोटी पर स्थित बाबा कालनाथ भैरव (भैरोंनाथ) का प्रसिद्ध मंदिर। यह मंदिर भैरव की गुमटी पर बना हुआ है और इसके बायें हिस्से में शक्तिकुंड स्थित है। भैरोंनाथ को गढ़वाल का रक्षक (द्वारपाल) माना गया है। धाम का प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। शीतकाल के दौरान यहां बर्फबारी का आनंद भी लिया जा सकता है। चोटी पर होने के कारण यहां से हिमालय का विहंगम नजारा देखते ही बनता है। साथ ही आसपास बिखरी हरियाली भी पर्यटकों असीम शांति की अनुभूति कराती है।लोक मान्यता है कि कालनाथ भैरों को काली वस्तुएं सर्वाधिक पसंद हैं। इसलिए यहां मंडुवे के आटे का रोट के रूप में प्रसाद तैयार किया जाता है। हर साल जेठ (ज्येष्ठ) के महीने यहां जात (जात्रा या यात्रा) के साथ दो-दिवसीय मेले का आयोजन होता है। मेले के प्रथम दिन राजखिल गांव से भैरवगढ़ तक जात निकाली जाती है। इस वार्षिक अनुष्ठान में हजारों की संख्या में श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। एक दौर में भले ही यहां पशुबलि की प्रथा रही हो, लेकिन अब यह प्रथा पूरी तरह बंद हो चुकी है। गढ़वाल पर गोरखाओं का प्रथम आक्रमण लंगूरगढ़ में ही हुआ था। इस युद्ध को लंगूरगढ़ युद्ध के नाम से जाना जाता है। तब लंगूरगढ़ पर असवाल ठाकुरों का राज हुआ करता था, जिन्होंने गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह की सेना की मदद से गोरखा सैनिकों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। तब इस किले को अजेय मानते हुए अजेयगढ़ (अजयगढ़) नाम से भी जाना जाने लगा। भैरों मंदिर के पुजारी राजखिल के डोबरियाल जाति के लोग ही होते हैं।

  •   साभार- दिनेश कुकरेती।

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