पलायन के सांस्कृतिक पहलू को नज़रअंदाज़ करती रही हैं चिन्ताजनक ताक़तें

जनमंच टुडे/ रामनगर

उत्तराखण्ड राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के साथ ही राज्य में व्याप्त बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुददों पर विमर्श शुरू हो चुका है। उत्तराखण्ड की राजनीति का इतिहास रहा है कि हर चुनाव से पहले इन मुददों पर बड़े जोर-शोर से विमर्श होता है। राजनैतिक दलों के घोषणा पत्र में बड़े-बड़े हर्फ़ों में इन्हें दर्ज किया जाता है। जनता को सपनों की दुनिया की सैर कराई जाती है, लेकिन चुनाव बीतते-बीतते इन मुददों को फिर से ठंडे बस्ते में डालकर राजनैतिक दल अगले पांच साल के लिए सत्ता के गलियारों की तीन-तिकड़म में व्यस्त हो जाते हैं। इस दौरान राज्य की तमाम जनपक्षधर ताक़तें इन मुददों को उठाते हुए इनके हल की आवाज़ उठाती रहतीं हैं। लेकिन इनकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह जाती है। राज्य के तमाम मुददों के बरअक्स राज्य से युवाओं के पलायन का मुददा इसलिए अधिक गम्भीर समझा जाता है कि यह राज्य के न केवल राजनैतिक कारकों को प्रभावित करता है बल्कि उत्तराखण्ड के भूगोल-संस्कृति को भी बुरी तरह प्रभावित करता है। हालांकि जनदबाव के कारण राज्य में पलायन के कारणों को समझने, पलायन को रोकने व पलायन के आंकड़ों को इकठ्ठा करने के लिए ‘पलायन आयोग’ का गठन किया गया है, जिसकी सिफारिशों पर सत्ता आधी-अधूरी तैयारियों के साथ छिटपुट काम करती रही है, जो कि पलायन की बढ़ती रफ्तार को नहीं थाम पाई है। ऐसे में पलायन आयोग के गठन और उसकी सिफारिशों पर ही सवाल खड़े होने शुरू हो जाते हैं। पलायन के ऐसे ही एक सांस्कृतिक पहलू को छूने की कोशिश करता मितेश्वर आनन्द का यह लेख है जो पलायन की अब तक अनछुई सांस्कृतिक वजह पर रोशनी डालता है। निःसंदेह पलायन उत्तराखण्ड की सबसे ज्वलंत समस्याओं में से एक है। आरम्भ से ही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की अनुपलब्धता पहाड़ से होने वाले पलायन के मुख्य कारण हैं। राज्य निर्माण के दो दशकों के बाद भी पर्वतीय क्षेत्रों में स्थिति कमोबेश जस की तस बनी हुई है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध कराने के सभी प्रयास पलायन की गति थामने में नाकाफी सिद्ध हुए हैं। भूतहा गांव पलायन की देन है। दुःखद बात यह है कि हर साल इनकी संख्या में वृद्धि होती जा रही है। पंडित दीनदयाल एम्बुलेंस सेवा जिसे 108 के नाम से ज्यादा जाना जाता है, में कदाचित अस्पताल के मुकाबले कही ज्यादा बच्चों ने जन्म लिया है। ढांचों के रूप में सरकारी विद्यालय जगह जगह बन चुके हैं लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता जस की तस बनी हुई है। सक्षम माता-पिता किसी हाल में अपने बच्चों को इन विद्यालयों में नहीं पढ़ाना चाहते हैं। नतीजा, अच्छी पढ़ाई के लिए गांव छोड़कर शहर की ओर प्रस्थान करना। रोजगार के नाम पर आधी-अधूरी मनरेगा योजना ही विकल्प है इसलिए अधिसंख्य के पास शहर जाने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नही होता है। यहाँ एक प्रचलित उक्ति है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी सदा मैदान के काम आये हैं। भौगोलिक रूप से एक दुरूह प्रदेश होने के कारण उत्तराखंड के लिए पलायन कोई नही चुनौती नहीं है। लंबे समय से रोजगार की तलाश में लोग मैदानों का रुख करते आये हैं। ब्रिटिशकाल से सैन्य सेवाओं के लिए बड़ी संख्या में युवा फौज में शामिल होते आये हैं। आजादी के बाद से आज तक पलायन बदस्तूर जारी है, क्योंकि पहाड़ चढ़ने में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सांस फूल गयी। राज्य निर्माण के बाद भी नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। एक निश्चित सीमा तक होने वाला पलायन किसी भी समाज के लिए हितकारी होता है किंतु जब इसकी गति अत्यधिक हो जाये तब पलायन के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियाँ भी उभरने लगती हैं। आर्थिक पक्ष के साथ साथ पलायन के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष पर चिंतन और विमर्श बहुत जरूरी है। प्रकृति उत्तराखंड की संस्कृति की जननी है क्योंकि यहाँ के जीवन का हिमालय, जल,जंगल आदि से अटूट सम्बन्ध है। प्रकृति की छत्रछाया में पनपी उत्तराखंड की संस्कृति सुंदर,सहज और सरल है। इस सरलता को पर्वतीय समाज की जीवनशैली में सहजता से अनुभव किया जा सकता है। निर्बाध पलायन से उत्पन्न परिस्थितियों ने यहां के समाज और संस्कृति पर निरंतर प्रहार किए हैं। यही कारण है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्या को केवल आर्थिक समस्या न मानकर सामाजिक-सांस्कृतिक समस्या भी मानना पड़ेगा। पलायन से गांव के गांव खाली हो चुके हैं। इन गांवों के खाली होने के कारण स्थानीय संस्कृति प्रभावित हुई है। लोकभाषा, लोककलाएं, लोकव्यवहार और लोकजीवन खंडित हुए हैं। नई पीढ़ी दुधबोली को लगभग त्याग चुकी है। सांस्कृतिक गौरव के भाव क्षीण पड़ चुके हैं। यदा-कदा विशेष अवसरों पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पहाड़ी कलाकारों की गीत-संगीत की प्रस्तुति को पर्याप्त मान लिया जाता है। महानगरों की चकाचौंध से युवा इतना आकर्षित है कि वह हर हाल में दिल्ली बम्बई जैसे महानगरों में जाकर ही रहना चाहता है। युवा दूल्हा-दुल्हन बनकर पहाड़ आने को नहीं बल्कि पहाड़ से जाने के लिए तैयार हैं। पलायन के आर्थिक-सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू आपस में गहरे जुड़े हुए हैं इसलिए इनके अंतर्संबंधों को समझना जरूरी है। अभाव ने जहां पलायन को जन्म दिया वही समय के साथ पलायन कर गए लोगों ने मैदानी जीवनशैली को अपना लिया। इस प्रकार पर्वतीय संस्कृति ने दोहरा आघात सहा। दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ आदि शहरों के प्रवासियों के बच्चे पंजाबी,मारवाड़ी और मराठी तो धाराप्रवाह बोलते हैं किंतु दुधबोली में बात करते समय एक रटा रटाया वाक्य निकलता है, “हमें पहाड़ी समझ तो आती है, मगर बोलनी नहीं आती। उन्हें मैदानी समाज आर्थिक सामाजिक दृष्टि से अधिक सशक्त नजर आता है। यही बात उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों में रह रहे युवाओं पर भी लागू होती है। अपनी बोली-भाषा और पहचान के साथ बिछोह साफ दिखाई देता है। ऐसा इसलिए हुआ है कि दशकों से मैदानी क्षेत्रों में बस जाने के चलते लोगों ने सुविधाभोगी जीवनशैली को अपना लिया है। यथार्थ का यह पक्ष प्रवासियों के पहाड़ के प्रति प्रेम और अनुराग की भावनाओं पर भारी पड़ता है। पलायन के मूल आधार आर्थिक अभाव का बने रहना भी बड़ा कारण है। रिवर्स पलायन को समस्या के एक समाधान या इसके स्वाभविक प्रत्युत्तर के तौर पर देखा जा रहा है किंतु यह आशिक समाधान भर है। गत वर्षों में अनेक प्रवासी उत्तराखंडी देश-विदेश से वापिस उत्तराखंड लौटे हैं जो एक अच्छी बात है मगर साथ ही हमें यह समझना होगा कि एक तो रिवर्स पलायन मौजूदा पलायन के मुकाबले नगण्य है और दूसरे यह कि रिवर्स पलायन पहाड़ के युवा की चाहत और मजबूरी दोनों के लिए कोई समाधान प्रस्तुत नही करता है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अपने जीवन के पंद्रह, बीस या अधिक वर्ष बाहर गुजारने के बाद चकाचौंध से मोहभंग हो जाने के बाद सुकून और शांति या फिर नए अवसरों की तलाश में वापिस लौटने का अधिकार ऐसे लोगों के पास है तो ठीक उसी तरह युवाओं को भी बाहर निकलकर महानगरों और विदेश में उपलब्ध अवसरों से लाभान्वित होने का हक़ है। इस दृष्टि से रिवर्स पलायन समाधान की कोई खास उम्मीद नहीं जगाता है। वास्तविकता यही है कि पलायन एक अत्यंत जटिल समस्या है। परिवेश की बाध्यताओं, व्यवस्थागत उपेक्षा और राजनीतिक दूरदृष्टि के अभाव के चलते समय के साथ यह बढ़ती चली गयी है। यद्यपि पलायन निरंतर सामाजिक विमर्श का विषय बना रहा है किंतु विमर्श तक ही अटका भी रह गया है। इस जटिल समस्या का कोई सरल समाधान दिखाई नही देता है। आर्थिक-सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों के अंतरसंबंध इसके समाधान को जटिल बनाते हैं। निःसंदेह समाधान का प्रथम बिंदु आर्थिक आयाम है किंतु सामाजिक सांस्कृतिक आयामों को अलग करके देखने पर केवल आर्थिक आयाम को दृष्टिगत रखकर किया गया प्रयास अधूरा रह जायेगा। सरकार और समाज को मिलकर इससे निपटने की योजना तैयार करनी होगी।
सुविख्यात मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो ने अपने ‘प्रेरणा के सिद्धांत’ में मनुष्य की आधारभूत आवश्यकताओं को पांच वर्गों में विभाजित किया है।  आत्मसम्मान की आवश्यकता तथा आत्मबोध। हमारे नीति नियंताओं और समाज के चिंतनशील वर्ग को मिलकर कुछ ऐसा करना पड़ेगा जिसके फलस्वरूप उत्तराखंड में रहते हुए ही अधिकांश व्यक्ति मूल आवश्यकताओं से लेकर जीवन में अपने लिए चयनित क्षेत्र के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर सके। जब तक नीतिगत चिंतन और तदनुरूप कार्यान्वयन को इस दिशा में नही मोड़ा जाएगा तब तक पलायन की चुनौती से निपटने के लिए किए गए प्रयास छितरे हुए, नाकाफ़ी और फलदायी सिद्ध नही होंगे। जितना जल्दी हो, इस दिशा में कदम बढ़ा देने चाहिए।

  • लेखक उत्तराखंड राज्यकर विभाग में  अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *