शिवरात्रि: शिव के प्राकट्य का दिवस
जनमंच टुडे। देहरादून। शिवरात्रि को शिव पार्वती के विवाह के रूप में मनाने की परंपरा कब आरंभ हुई और कब इसने एक बाजारू, फूहड़ स्वरूप ग्रहण कर लिया_यह कोई नहीं जानता। पर यह बिल्कुल स्पष्ट है कि शिवरात्रि किसी भी प्रकार माता सती अथवा माता पार्वती के साथ भगवान शिव के पाणिग्रहण से संबद्ध नहीं है। दक्ष पुत्री उमा (माता सती) के साथ भगवान शिव का विवाह चैत्र शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि को पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र में रविवार के दिन संपन्न हुआ और चैत्र पूर्णिमा के दिन भगवान शिव सपत्नीक कैलाश पर्वत लौट आए। आज भी बंगाल तथा नॉर्थ ईस्ट के कुछ क्षेत्रों में चैत्र पूर्णिमा को भगवान शिव व माता सती का विवाह का उत्सव मनाने की परंपरा है और इसे गाजन या शिव आद्या विवाह के नाम से जाना जाता है। प्रभु श्रीराम के संदर्भ में भगवान शिव के कथन पर अविश्वास के पश्चात जब माता सती ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुंड में कूदकर स्वयं का शरीरांत कर लिया तो शिव पुनः शव समान हो गए। जब तारकासुर का भय व्याप्त हुआ तो देवताओं ने शिव से पुनः विवाह करने का अनुरोध किया क्योंकि तारकासुर ने अपनी मृत्यु को लेकर एक अत्यंत जटिल वरदान मांग लिया था और उसका वध भगवान शिव के विवाह के फलस्वरूप जो पुत्र उत्पन्न होता उसी के हाथों संभव था। अंततः भगवान शिव ने विवाह के लिए अपनी स्वीकृति दी और इस बार मुहूर्त की जिम्मेदारी सप्तऋषियों को दी गई। उन्होंने वैशाख शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, दिन सोमवार, मृगशिरा नक्षत्र के उत्तरार्ध को विवाह हेतु चयनित किया क्योंकि यह दाम्पत्य की स्थिरता के साथ साथ उत्तम व अपराजेय संतान प्राप्ति के लिए भी अत्यन्त अनुकूल था। सप्तऋषियों में ज्योतिष विद्या के सबसे बड़े स्तंभ ऋषि गर्ग ने इस मुहूर्त का चयन किया था। उनकी गर्ग संहिता आज भी ज्योतिषशास्त्र का एक प्रमाणिक ग्रंथ मानी जाती है। यद्यपि उड़ीसा में भगवान शिव का विवाह ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि को मानने की परंपरा है पर इसे सत्य से विचलन मानना पड़ेगा क्योंकि 400 वर्ष पूर्व ही यह मत सामने आया है। पर किसी भी उपक्रम से, किसी भी स्रोत से शिवरात्रि पर भगवान शिव के विवाह की पुष्टि नहीं होती। देवी पुराण,स्कंद पुराण और शिव पुराण से इसकी पुष्टि की जा सकती है। शिवरात्रि तो शिव के प्राकट्य का दिवस है: अग्नि लिंग रूप में शिव का प्राकट्य दिवस शिवरात्रि त्रयोदशी युक्त चतुर्दशी की रात्रि में,फाल्गुन माह में मनाए जाने की परंपरा भारत में सर्वत्र है। अगले दिन स्नानादि के पश्चात पूजन और व्रत का परण होता आया है। प्राण ऊर्जा और ध्यान ऊर्जा के आरोहण हेतु इससे अच्छा कोई अन्य दिवस नहीं। सवाल फिर वहीं का वहीं है कि इस विशुद्ध आध्यात्मिक अवसर का इतना बाजारीकरण किसने किया? हो सकता है अवसान के किसी कालखंड में यह गलत परंपरा चली हो किंतु हमें अत्यधिक सजगता के साथ शिवरात्रि के मूल स्वरूप को पुनर्स्थापित करना ही होगा।।
- लेखक विजय सिंह पंवार
