आंचलिक भाषा के विकास में मठपाल के योगदान को किया याद
जनमंच टुडे। रामनगर। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कुमाऊंनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की दूसरी पुण्य तिथि के अवसर पर हो रहे चार दिवसीय कार्यक्रम के तहत रविवार को उनकी कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति के साथ साथ “हमरी दुदबोलि, हमर पछ्याण” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पर्वतीय सभा लखनपुर में हुए इस कार्यक्रम की शुरुआत मठपाल के चित्र पर माल्यार्पण से हुई,जिसके बाद रंगकर्मी मानसी रावत, ललित बिष्ट, सौरभ बिष्ट, विजय जमावल की टीम द्वारा उनकी कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति की गई। कार्यक्रम संयोजक प्रो. गिरीश पंत ने अतिथियों का स्वागत करते हुए मठपाल के साहित्य के विविध आयामों पर बातचीत रखी। “हमरी दुदबोलि, हमर पछ्याण” विषय पर आधार वक्तव्य देते हुए श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय ऋषिकेश के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अधीर कुमार ने कहा मठपाल कुमाउं क्षेत्र के ही नहीं समूचे उत्तराखण्ड के लिए प्रेरणाश्रोत हैं। उत्तराखण्ड की आंचलिक भाषा के विकास में उनके द्वारा किये गए योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। शायद यही कारण रहा कि मथुरादत्त मठपाल को साहित्य अकादमी द्वारा पहली बार कुमाऊंनी भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देते हुए ‘भाषा सम्मान’ के लिये चुना गया। गौरतलब है कि कुमाऊं भाषा के विकास के लिए समय पूर्व रिटायरमेंट लेने के बाद बाद मठपाल ने रामनगर शहर के पंपापुरी स्थित अपने आवास से वर्ष 2000 में ‘दुदबोलि’ नाम से कुमाऊंनी पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था। दुदबोलि के 24 त्रैमासिक (64 पृष्ठ) अंक निकालने के बाद 2006 में इसे वार्षिक (340 पृष्ठ) का कर दिया गया था। जिसमें लोक कथा, लोक साहित्य, कविता, हास्य, कहानी, निबंध, नाटक, अनुवाद, मुहावरे, शब्दावली व यात्रा वृतांत जैसी कई विधाओं को जगह दी गई थी। डाॅ. रमेश शाह, शेखर जोशी, ताराचंद्र त्रिपाठी, गोपाल भटट, पूरन जोशी, डाॅ. प्रयाग जोशी सरीखे 50 से भी ज्यादा लब्धप्रतिष्ठित कवि व लेखक ‘दुदबोलि’ से जुड़े रहे। बांग्ला, गुजराती, अंग्रेजी, संस्कृत, हिंदी, नेपाली, गढ़वाली साहित्य को भी मूल रूप में या उसके कुमाउंनी अनुवाद को इसमें स्थान दिया गया था। श्रीमद्भगवद्गीता और कालिदास के मेघदूत का कुमाऊंनी अनुवाद भी इसमें प्रकाशित हुआ था। इसके साथ ही नेपाली और कुमाउंनी बालगीत भी इस पत्रिका में छापे गए थे।कार्यक्रम में एसएसजे अल्मोड़ा विश्वविद्यालय योग विभागाध्यक्ष प्रो. नवीन भट्ट ने कहा मठपाल जी के स्वयं रचित पांच काव्य संकलन प्रकाशित हुए। आजादी से पहले व बाद में भी कुमाऊंनी भाषा में अनेक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई हैं। मगर ‘दुदबोलि’ पत्रिका के प्रकाशन की निरंतरता और इसका समर्पणभाव अनूठा ही था। नेवलगांव सल्ट महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. बी.एम. पांडे ने कहा जिस दिन भी कुमाऊंनी बोली संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो पाएगी तो उसका एक कारण मठपाल का ‘दुदबोलि’ पत्रिका में लिपिबद्ध किया गया साहित्य का आधार होगा जो इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि कुमाऊंनी मात्र एक बोली नहीं अपितु साहित्य सृजन की एक उत्कृष्ट भाषा भी है। एक संचेतनशील कवि और साहित्यकार होने के अलावा ‘दुदबोलि’ जैसी कुमाऊंनी भाषा और साहित्य को समर्पित पत्रिका का कठिन परिस्थितियों में भी सम्पादन और प्रकाशन का कार्य निरन्तर रूप से जारी रखना, उनका समर्पित अविस्मरणीय योगदान ही माना जाएगा। मथुरादत्त मठपाल माटी की नराई, जात-थात की धात, च्यूड़- हरेला-घुघुत-बिरुड़ की लीक, मेले-कौतिक-जात्राओं की झरफर, अपने कुमैया होने की चिनाण, आण-काणि कथ्यूड़ों को कंछ-मंछों तक पहुँचाने में लगे रहने वाले एक ऐसे रचनाकार हैं, जो एक लम्बे समय तक ‘दुदबोली’ पत्रिका एवं अपने स्फुट लेखन के माध्यम से कुमाउंनी के आँखरों की सज-समाव, टाँज-पाँज करते रहे। अपने लेखन में भाषा की चिन्ता करने वाले मठपाल की कविताओं में कुमाऊंनी की ठसक, लय-ताल, लोकोक्तियाँ, मुहावरे, उतार-चढ़ाव और बिम्बात्मकता का सुघड़ समन्वय उनको अन्य कवियों से विशिष्ट बना देता है। गद्य साहित्य में भी उनका योगदान रहा लोकवार्ता (कंथ कथ्यूड़) दुदबोलि पत्रिका की भूमिका/किताबों की भूमिका और शब्दार्थ बोधिनी में उनका गद्य देखने को मिलता है। गीत नाटिका/नृत्य नाटिका के रूप में उनकी चंद्रावती सत् परीक्षण, ‘महंकाली अवतरण’, ‘कद्रू वनिता’, ‘गोपीचंद भरथरी’ ये चार गीत नाटिकाएँ बहुत से मंचों पर खेली गयी हैं। उन्होंने सबसे पहले कुमाउंनी के 3 बड़े कवियों शेर सिंह बिष्ट (शेरदा अनपढ़) की ‘अनपढ़ी’ 1986 ई0 और गोपाल दत्त भट्ट की ‘गोमती गगास’ 1987 ई0 और हीरा सिंह राणा कि ‘हम पीर लुकाते रहे’ 1989 ई0 नाम से तीन किताबों को हिन्दी अनुवाद के सहित प्रकाशित किया। मठपाल जी ने स्वयं के चार काव्य संकलन प्रकाशित किये। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. बृजमोहन गुप्ता ने कहा वे अपने कवि कर्म के साथ-साथ दशकों से कुमाऊंनी बोली-भाषा, साहित्य के उन्नयन हेतु एक समर्पित व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते रहे। अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, नैनीताल जिला मुख्यालयों पर भाषा सम्मेलनों का सफल आयोजन कर मथुरादत्त मठपाल ने ही इस उपेक्षित सी लोक भाषा को सम्मानित स्तर पर खड़ा करने की पहल की थी, नतीजतन इधर कुमाऊंनी में कई कविता संग्रह देखने को मिले हैं। किंतु कहना होगा कि कवि मठपाल के भाव की गहराइयों को उसके रचना कौशल की ऊंचाइयां तराश रही होती हैं, वे कविताएं निश्चित रूप से कुमाऊंनी की अग्रिम पंक्ति की कविताओं में भी अग्रिम हैं।प्रो. बृजमोहन गुप्ता की अध्यक्षता और निखिलेश उपाध्याय के संचालन में सम्पन्न इस कार्यक्रम में प्रो. बृजमोहन गुप्ता, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश पंत, प्रो. अधीर कुमार, नेवलगांव सल्ट महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. बीएम पांडे, गौलापार महाविद्यालय के प्राचार्य संजय कुमार, पत्रकार यूनियन अध्यक्ष जितेंद्र पपनै, निखिलेश उपाध्याय, भुवन पपनै, नवीन तिवारी, नंदिनी मठपाल, केसी त्रिपाठी, विमला देवी, नंदराम आर्य, नवेंदु मठपाल, हरिमोहन मोहन, डा. दुर्गा तिवारी, विशंभर दत्त पंत, केसी त्रिपाठी, सुभाष गोला, मुरली कापड़ी, भुवन पांडे, नवेंदु जोशी, हेमंत कुमार, केएन गहत्याडी, नवीन सत्यवली, मेनका रानी, राजेश भट्ट, पंकज सती, पुष्पा मठपाल, उमा ध्यानी मौजूद रहे।
