विस चुनाव में क्या गुल खिलाएगी उपेक्षित भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी?

देहरादून।  प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस उत्तराखण्ड न्याय यात्रा निकाल कर भाजपा सरकार को विभिन्न जनहित के मुद्दों पर घेरने में जुटी हुई है। साथ ही  संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के लिए सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों, सांगठनिक जिलों, प्रकोष्ठों और विभागों में नए प्रभारियों व पदाधिकारियों को जिम्मेदारियां सौंप दी हैं। वहीं सत्ता पर लगातार तीसरी बार काबिज होने का लक्ष्य लेकर चल रही भारतीय जनता पार्टी के सामने हैट्रिक बनाने की बड़ी चुनौती है। वहीं दूसरी तरफ उपेक्षित महसूस कर रहे पुराने, नये समर्पित कार्यकर्ताओं की दबी जुबान में चल रही नाराजगी पार्टी के लिए सिरदर्द बन सकती है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, यदि इस अंदरूनी असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो पार्टी को कुछ क्षेत्रों में अप्रत्याशित नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं राष्ट्रीय कार्यकारिणी में प्रदेश के युवाओं को महत्व न देने पर युवा कार्यकर्ता भी नाराज बताए जा रहे हैं।आपको बता दे कि हाल ही में सामने आई पार्टी की आंतरिक सर्वे रिपोर्ट ने सत्ता के गलियारों में खलबली मचा रखी है। इस गोपनीय सर्वे में जनता और कार्यकर्ताओं के बीच मौजूदा विधायकों की सत्तारूढ़ विरोधी लहर साफ देखी गई है। लगभग 32 मौजूदा विधायकों के टिकट कटने की आशंका ने न सिर्फ विधायकों की धड़कनें बढ़ा दी हैं, बल्कि उनके समर्थक कार्यकर्ताओं में भी असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। वहीं दूसरी ओर कई कार्यकर्ता पार्टी और विधायकों पर अनदेखी करने से आहत बताए जा रहे, जिसके कारण जमीनी स्तर पर पार्टी कैडर में शिथिलता आने की आशंका बनी हुई है। भाजपा के लिए चिंता की बात केवल जमीनी कार्यकर्ताओं की नाराजगी तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के वरिष्ठ और पुराने चेहरों का छिटकना भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। हाल ही में चकराता विधानसभा से भाजपा प्रत्याशी रहे देहरादून के पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रामशरण नौटियाल और पौड़ी के पूर्व विधायक यशपाल बेनाम के भाजपा से इस्तीफा ने इस असंतोष को और बल दे दिया है। यद्यपि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इस दलबदल को यह कहते हुए खारिज किया है कि एक-दो नेताओं के जाने से  कोई फर्क नहीं पड़ता। वहीं वरिष्ठ एवं युवा कार्यकर्ताओं के अनुसार यदि समय रहते पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान की रक्षा नहीं की गई, तो चुनाव आते-आते यह नाराजगी एक बड़े सियासी विस्फोट का रूप ले सकती है। वहीं पार्टी आलाकमान ने विस्तारकों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अगस्त-सितंबर से शुरू हुए संगठनात्मक कैलेंडर के तहत रूठे हुए नेताओं और उपेक्षित कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर मनाया जाए और सरकार के विकास कार्यों के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर जनता के बीच पैठ बनाई जाए। अब देखना यह होगा कि भाजपा का यह डैमेज कंट्रोल प्लान कार्यकर्ताओं की नाराजगी को दूर करने में कितना सफल रहता है।

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