पहाड़ के अस्पताल डाक्टर विहीन, देहरादून में डाक्टरों की भरमार

जनमंच टुडे/देहरादून।

पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल अवस्था में है, डाक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं है। कहीं डाक्टर नही है तो कहीं दवा। जिसके चलते पहाड़वासियों को छोटी, छोटी बीमारियों के इलाज के लिए शहरों का रुख करना डटा है, जिससे उनका समय और धन बर्बाद हो रहा है। राज्य बनने के 21 सालों बाद भी स्वास्थ्य सुविधाओं में कोई इजाफा नहीं हुआ। उत्तराखंड के पास सिर्फ 43 प्रतिशत स्पेशलिस्ट डॉक्टर है, जनपद टिहरी, चमोली और पौड़ी  जिलों में स्वीकृत की तुलना में कार्यरत सबसे कम स्पेशलिस्ट डाॅक्टर हैं।एसडीसी फाउंडेशन ने ‘स्टेट ऑफ़ स्पेशलिस्ट डाॅक्टर्स इन उत्तराखंड-2021’ पर अध्ययन रिपोर्ट तैयार की है। टिहरी जिले में 98 स्पेशलिस्ट डॉक्टर के स्वीकृत पद हैं लेकिन यहां सिर्फ 13 डाक्टर ही अपनी सेवा दे रहे हैं।टिहरी जिले में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के स्वीकृत कुल 98 पदों में से केवल 13 पर नियुक्ति है। 85 पद खाली हैं। जिले में एक भी सर्जन, ईएनटी, फॉरेंसिक, स्किन, माइक्रोबायोलॉजी और मनोरोग विशेषज्ञ नहीं है। यहां बालरोग विशेषज्ञ, फिजिशियन और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ के केवल एक-एक पद पर नियुक्ति हुई हैं, जबकि स्वीकृत पदों की संख्या क्रमशः 14, 15 और 12 है। इसके अलावा, जिले में 15 स्वीकृत में से केवल दो स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं।

एसडीसी फाउंडेशन को प्राप्त आरटीआई सूचना के अनुसार  राज्य के 13 जिलों में कोविड-19 संक्रमण के बीच कुल 15 अलग अलग स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की श्रेणी मे जरूरत के मात्र 43 प्रतिशत स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की सेवाएं ही उपलब्ध हैं। राज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग द्वारा उपलब्ध कराय गए डाटा के अनुसार राज्य में 30 अप्रैल, 2021 को स्पेशलिस्ट डाॅक्टरों के कुल 1147 स्वीकृत है, जिनमे से मात्र 493 ही डॉक्टर कार्यरत हैं और 654 पद खाली हैं। देहरादून जिले में जबकि देहरादून में डॉक्टरों की कोई कमी नहीं है, यहां सबसे ज्यादा स्पेशलिस्ट डॉक्टर उपलब्ध हैं। यहां 92 प्रतिशत स्पेशलिस्ट डाॅक्टर हैं, जबकि  63 प्रतिशत डाॅक्टरों के साथ रुद्रप्रयाग दूसरे स्थान पर है। टिहरी, चमोली और पौड़ी जिले मे क्रमश 13%, 27% और 28% स्पेशलिस्ट डाॅक्टरों की स्वीकृत पदों की तुलना मे उपलब्धता के साथ स्थिति सबसे ख़राब है।  राज्य में फोरेंसिक स्पेशलिस्ट के कुल स्वीकृत 25 पदों में से केवल एक फोरेंसिक स्पेशलिस्ट है। स्किन डिजीज के 38 और साइक्रेटिस्ट के 28 पद स्वीकृत हैं, जबकि इन दोनों पदों पर केवल चार-चार स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की ही नियुक्ति की गई हैं। ऐसे वक्त में जबकि कोविड-19 तीसरी लहर का खतरा मंडरा रहा है, उत्तराखंड में जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ मात्र 14 प्रतिशत और बाल रोग विशेषज्ञ केवल 41 प्रतिशत हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञ केवल 36 प्रतिशत हैं। एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल कहते हैं कि यह कमी बेहद चिंताजनक है, खासकर ऐसे समय में जबकि हम महामारी के दौर से गुजर रहे हैं। उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया कि वह जल्द से जल्द विशेषज्ञ डाॅक्टरों के खाली पदों पर नियुक्तियां  शुरू करे। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की उचित व्यवस्था न होने से कोविड-19 के दौर में किये जाने वाले हमारे प्रयास बेअसर साबित हो सकते हैं। इन स्थितियों का ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों पर अधिक असर पड़ता है, जिसे अनदेखा किया जाता है। उनका कहना है कि कुछ दिन पहले कई विधायक नवनिर्वाचित स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत से मिले थे और राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती का मुद्दा उठाया था। इससे पहले 2018 में नीति आयोग की एक रिपोर्ट में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति के मामले में भी उत्तराखंड को तीन सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों की श्रेणी में रखा गया था। एसडीसी फाउंडेशन की अध्ययन टीम के सदस्य और शोधकर्ता विदुष पांडे कहते हैं कि राज्य के जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के लगभग 60 प्रतिशत पद खाली हैं। एसडीसी फाउंडेशन के रिसर्च एंड कम्युनिकेशंस हेड ऋषभ श्रीवास्तव कहते हैं कि फाउंडेशन ने पहले राज्य में पूर्णकालिक स्वास्थ्य मंत्री के लिए अभियान चलाया था। नए सीएम पुष्कर सिंह धामी की नियुक्ति के बाद राज्य को पूर्णकालिक स्वास्थ्य मंत्री मिल चुके हैं। वे कहते हैं कि राज्य में स्त्री रोग विशेषज्ञों की केवल 36 प्रतिशत उपलब्धता दर्शाती है कि हालात बेहद खराब हैं और इसका सीधा प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

 

 

 

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