कोटद्वार : स्थानीयों पर भारी “आलाकमान” का निर्णय

  • प्रीती नेगी / जनमंच टुडे/ देहरादून।

गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार जनपद पौड़ी की सर्वाधिक मतदाता वाली विधानसभा सीटों में से एक है।  राज्य बनने के बाद से यहां हर बार कांग्रेस और भाजपा में ही मुख्य मुक़ाबला होता रहा है।  इस बार  मुकाबला भाजपा और कांग्रेस  के साथ ही भाजपा के बागी धीरेंद्र चौहान में होने की प्रबल संभावना है। राज्य बनने के बाद 2002 में पहली बार अस्तित्व में आई कोटद्वार विस सीट यूपी के जमाने में बेहत बड़े क्षेत्रफल वाली सीट हुआ करती थी और यह लैंसडौन विस क्षेत्र के अंतर्गत आती थी। पृथक राज्य बना तो परिसीमन में कोटद्वार विस सीट बन गई।  इस सीट पर हर बार ही बदलाव देखने को मिलता है। 1,14842 मतदाताओं की संख्या वाले कोटद्वार विस क्षेत्र में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से अब तक हुए चुनावों में इस सीट पर तीन बार कांग्रेस और दो बार भाजपा का कब्जा रहा। भाजपा ने राज्य गठन के बाद आज तक किसी भी स्थानीय कार्यकर्ता को प्रत्याशी नहीं बनाया( शैलेन्द्र रावत को छोड़कर) और झंडा, डंडा थामने तक सीमित रखा हुआ है। 2002 से भाजपा  आलाकमान द्वारा कोटद्वार के लिए अपना गया पैराशूट  का फंडा आज भी जारी है, जिससे स्थानीय कार्यकर्ताओं को उभरने का मौका नहीं मिल पा रहा है। कोटद्वार विधानसभा सीट पर भाजपा ने एक बार फिर बाहरी से प्रत्याशी पर दांव लगाया है।  यहां से कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी- 2002, 2012 कांग्रेस भाजपा के शैलेंद्र सिंह रावत- 2007 और डा. हरक सिंह रावत-2017 विधायक रहे।  इस विस सीट पर महिला और पुरुष मतदाताओं का अनुपात लगभग एक समान है। यह पुरुष मतदाताओं की 57 हजार ,401 है, जबकि महिला मतदाताओं की संख्या 57 हजार 340 है। कांग्रेस ने शुरू से ही हर चुनाव में स्थानीय व्यक्ति को ही तरजीह दी और उसे मैदान में उतारा, जबकि भाजपा ने आज तक किसी भी स्थानीय व्यक्ति को टिकट नहीं दिया और हर बार पैराशूट प्रत्याशी को मैदान में उतारा।  भाजपा का कोटद्वार विस सीट पर पैराशूट प्रत्याशी उतारने का  सिलसिला 2002 से शुरू हुआ था जो आज तक जारी है। 2002 हुए विस चुनाव में भाजपा ने कोटद्वार से पहला पैराशूट प्रत्याशी के रूप में दिल्ली से  चुनाव लड़ने आए अनिल बलूनी को मैदान में उतारा, लेकिन, उनका नामांकन निरस्त हो गया। इसके बाद भाजपा के बागी होकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे भुवनेश खर्कवाल को समर्थन दिया, लेकिन वह जीत नहीं पाए।  2005  में हुए उपचुनाव में  भाजपा ने स्थानीय को फिर  दरकिनार कर अनिल बलूनी को मैदान में उतारा, लेकिन वह चुनाव हार गए। उसके बाद उन्होंने कभी कोटद्वार से चुनाव नहीं लड़ा।  भाजपा ने 2007 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए दुग्गड़ा के तत्कालीन ब्लॉक प्रमुख शैलेंद्र रावत को मैदान में उतारा। रावत ही एक मात्र स्थानीय व्यक्ति थे, जिन्हें भाजपा ने टिकट दिया था। इसके बाद  2011 से 2012 तक चुनाव से ठीक पहले बीसी खंडूडी दोबारा मुख्यमंत्री बने तो 2012 के विधानसभा चुनाव में ‘खंडूड़ी है जरुरी’  नारे पर भाजपा ने चुनाव लड़ा, और खण्डूड़ी को कोटद्वार से चुनावी मैदान में उतारा, लेकिन खण्डूडी को  यहां की जनता ने नकार दिया और उन्हें हार का सामना करना पड़ा।  उन्हें कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी ने 4,623 वोटों से हरा दिया। खंडूड़ी को 27,174 और नेगी को 31,797 वोट मिले थे। इस हार के बाद खंडूड़ी सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। 2017 में हुए चुनाव में भाजपा ने फिर स्थानीय कार्यकर्ता को हाशिये पर डाल दिया और कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए डा. हरक सिंह रावत को कोटद्वार विस सीट से मैदान में उतारा। मोदी लहर के चलते, सुरेन्द्र सिंह नेगी को इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। इस बार  स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी की आलाकमान स्थानीय कार्यकर्ता को टिकट देगा, लेकिन भाजपा आलाकमान ने अपने इतिहास को दोहराते हुए स्थानीय प्रत्याशी को दरकिनार कर यमकेश्वर की विधायक रितु खण्डूड़ी भूषण को कोटद्वार से मैदान में उतार दिया और पैराशूट प्रत्याशी उतारने की अपनी परंपरा को आगे बढ़ाया । इससे भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता  धीरेन्द्र चौहान आलाकमान के निर्णय से नाराज हो गए और पार्टी से बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतर गए।

 

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