संजय ने भरी हौसलों की उड़ान

देहरादून। कोरोना ने जहां लाखों लोगों की नौकरियों को निगल कर उन्हें बेरोजगार कर दिया, वहीं छोटे से लेकर बड़े व्यवसाइयों के व्यवसाय पर ब्रेक लगा दिया।  लाखों लोगों ने रोजी, रोटी गवां कर गांवों की ओर रिवर्स पलायन किया। इस दौरान जिनमें कुछ करने का जज्बा था वे मंजिल पा गए, और जिसने हार मान ली वह दुनिया की भीड़ में कहीं खो से गए। प्रधानमंत्री ने अपनी नौकरी खोने वाले युवाओं को दोबारा आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया और उनके लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति दी।  लॉकडाउन के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए आत्मनिर्भर भारत अभियान की शुरुआत की, जो कोविड-19 महामारी संकट से लड़ने में कारगर साबित हुई। जो युवा  कोविड के चलते अपनी जॉब खो चुके थे, उन्होंने हार नही मानी और पीएम  मोदी के आत्मनिर्भर भारत से प्रोत्साहित होकर अपना कार्य शुरू किया और साथ ही लोगों को भी रोजगार मुहैया करवा कर समाज मे एक नजीर पेश की। मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान  को अपना कर एक पूर्व फौजी ने कोरोना काल में रोजगार तो खोला ही साथ ही 100 लोगों को रोजगार भी मुहैया कराया। कहते हैं ना मंजिल उन्ही को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है,पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। अगर मन में कुछ कर गुजरने की ललक व तमन्ना हो तो कोई भी मंजिल कठिन नहीं होती और मुश्किल काम भी आसान हो जाते हैं, और ऐसे लोग समाज के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। ऐसी ही एक अनोखी कहानी है एक पूर्व सैनिक संजय सिंह बिष्ट की जिन्होंने पहले देश सेवा की। जब वह रिटायरमेंट आए तो उनके दिल में युवाओं के भविष्य को लेकर सुनहरा सपना बुना और लाखों रुपए लगाकर कोटद्वार में लक्ष्य नाम से कोचिंग सेंटर खोला। कोचिंग सेंटर में नई दिल्ली के शिक्षकों की तैनाती की। लेकिन कोरोना के चलते शिक्षकों को भारी भरकम वेतन न दे पाने के कारण कोचिंग सेंटर को बन्द करना पड़ा, कोचिंग सेंटर बन्द होने के कारण युवाओं के भविष्य को तराशने का उनका जो सपना था वह कोरोना ने तोड़ दिया।


सेंटर बन्द होने के बाद उन्होंने अपने पैतृक गांव लौटने का फैसला किया और अपना समान समेटकर गांव की राह पकड़ ली। संजय सिंह बिष्ट ने बताया कि उनका जन्म नरेंद्र सिंह बिष्ट ग्राम चमाली,पोओ सतपाली, ब्लॉक एकेश्वर के घर मे हुआ। गांव से 12वीं की शिक्षा लेने के बाद वह बीजी (फौज) का भर्ती हो गए। वह 2001 से 2003, 2005 से 2007, 2010 से 2011 तक साउथ पोल यानि दक्षिणी ध्रुव में भारतीय रिसर्च सेंटर में तैनात रहे। उन्होंने बताया कि वहां रहना बेहद कठिन होता है। यहां 6 माह रात और 6 माह उजाला यानि दिन रहता है। बिष्ट ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद मेरे मन मे कुछ करने की ललक जागी और युवा हर क्षेत्र में बेहतर कर सके, इसके लिए कोटद्वार में लक्ष्य नाम से कोचिंग सेंटर की नींव रखी और, युवाओं के भविष्य को तराशने के लिए नई दिल्ली से उच्च शिक्षित व प्रशिक्षित शिक्षकों को भारी भरकम सेलरी पर रखा, लेकिन कोरोना के चलते सब कुछ तबाह हो गया।

बिष्ट ने कहा मैं शिक्षकों को भारी भरकम वेतन देने में असमर्थ हो गया तो कोचिंग सेंटर बन्द करना पड़ा और बुझे मन से गांव की ओर चल पड़ा। भीमल से शैम्पू बनाने को लेकर उन्होंने एक किस्सा सुनाया। बिष्ट के अनुसार लॉकडाउन के चलते सभी प्रवासी अपने मूल स्थान को लौट चुके थे। हमारे गांव में लोग दिल्ली से घर आए थे। एक दिन आंगन में चर्चा का दौर चल रहा था तो, एक महिला जो दिल्ली से आई थी। शैम्पू न होने पर उन्होंने   बाल धोने के लिये भीमल के रेशे को मंगवाया। सब ने भीमल की खासियत का बखान किया तो मेरे दिल मे भीमल से शुद्ध प्राकृतिक शैम्पू बनाने की जिज्ञासा जाग उठी और मैं इस काम के लिए जुट गया।

 

लगातार पांच महीने तक पुराने लोगों से जानकारियां हासिल करने व अध्ययन के बाद मैंने अपने इस प्रोडक्ट को धरातल पर उतारा। उन्होंने बताया कि काम शुरू करने में कठिनाई जरूर हुई, कच्चे माल की आवक नहीं होने से उत्पादन करने में कठिनाई हुईं। बाजार उपलब्ध नहीं हो पाया। सरकार अगर प्लेटफार्म तैयार कर दे स्वरोजगार करने के लिए धन की व्यवस्था कर दे तो हमारे पहाड़ में क्या कुछ नही हो सकता।अगर कोई सब्जियों और फूलों का उत्पादन करता है तो उसको खरीदार ही नहीं मिल पाता जिस कारण उसे हानि उठानी पड़ती है और कोई स्वरोजगार करना ही नहीं चाहता। युवाओं को हानि से बचाने के लिए सरकार को बाजार उपलब्ध कराना होगा तभी, लोगों का झुकाव स्वरोजगार की तरफ होगा साथ ही बिष्ट ने कहा कि सरकार को रोजगार , स्वरोजगार के साथ ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, बेहतर शिक्षा की सुविधाएं पहाड़ में उपलब्ध करानी होगी। यह सब सुविधाएं उपलब्ध हो जाए तो पलायन रुक जाएगा। बिष्ट ने बताया कि शैम्पू के लिये बोतल, बोतल के ढक्कन, रेपिंग गुजरात, मेरठ, हरिद्वार से मंगवाना पड़ता है। जिससे इसकी लागत थोड़ी बढ़ जाती है, अगर यह सामान प्रदेश में ही मिल जाए तो बेहतर होगा।

संजय बिष्ट ने बताया कि इस समय वह 100 लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं, भविष्य में वह अपने काम को विस्तार देने की योजना बना रहे हैं, जिससे लोगों को अधिक से अधिक रोजगार मिल सके और पलायन को रोका जा सके। बिष्ट ने कहा कि कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहता, क्यों कि उसको घाटे का डर सताता है। बिष्ट कहते हैं, काम शुरू करने से पहले ही घाटे का मूल्यांकन करना अनुचित है। उन्होंने युवाओं से शायराना अंदाज में कहा कि…

मंजिले बड़ी जिददी होती है। हासिल कहां नसीब से होती है। मगर वहां तूफान भी हार जाते हैं।। जहां कश्तियां जिद्द पर होती है।।

जब तक कोई मैदान में नही उतरेगा उसके लिए डर और हार  कोई मायने नहीं रखती।  उन्होंने कहा  मुझे भी घाटे के भय ने डराया, लेकिन मैंने अपने कदम पीछे नही खिंचे। उन्होंने बताया कि धीरे, धीरे उनके उत्त्पाद की मांग प्रदेश के साथ ही नई दिल्ली, नोयडा,गुड़गांव, गुजरात, देहरादून जैसे बड़े शहरों में बढ़ रही है। उन्हहोंने युवाओंं से स्वरोजगार अपना केेर आर्थिकी को मजबूत करने की अपील की।

 

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