चला गया चौंदकोट का ‘महान शिल्पी’

जनमंच टुडे/ देहरादून।

पहाड़ी टोपी को देशभर में पहचान दिलाने वाले फैशन डिजाइनर (शिल्पी) कैलाश भट्ट का देहरादून के इंद्रेश अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। वह 51 वर्ष के थे। वह कुछ समय से बीमार चल रहे थे। पहले उनको चमोली जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसके बाद उन्हें देहरादून रेफर किया गया था।  कैलाश भट्ट ने उत्तराखंड की टोपी और पारंपरिक परिधान मिरजई को देश में ही नहीं बल्कि विश्व में पहचान दिलाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। कैलाश गोपेश्वर के हल्दापानी के रहने वाले थे।  वह अपने पीछे पत्नी, पुत्र व पुत्री को छोड़ गए हैं। कैलाश जाने-माने रंगकर्मी भी थे। कैलाश बाल्यकाल से ही पारंपरिक परिधानों के निर्माण  कार्य में लगे हुए थे। लोक शिल्पी कैलाश भट्ट ने अपने इसी हुनर के माध्यम से मिरजई, आंगड़ी, झकोटा,घुंघटी,गाती, ऊनी सलवार,त्यूंखा, अंगोछा, दौंखा, सणकोट, गमछा, लव्वा,पहाड़ी टोपी जैसे उत्तराखंडी पारंपरिक परिधानों से नई पीढ़ी को  रूबरू कराया। कैलाश ने श्रीनंदा देवी राजजात की पोशाक और देवनृत्य में प्रयोग होने वाले मुखौटा को भी लोकप्रियता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  कैलाश भट्ट का जन्म पौड़ी जिले के चौंदकोट परगना के एकेश्वर ब्लाक के ग्राम बिंजोली में हुई। उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज एकेश्वर से शिक्षा ली। उसके बाद उन्होंने  एकेश्वर बाजार से शिल्पी के गुर सीखे और अपनी पहचान उत्तराखण्ड के फलक पर बनाई। उनके अंदर कलाकारी कूट, कूट कर भरी हुई थी। कैलाश स्कूल में होने वाले सांस्कृतिक प्रोग्राम में हमेशा हिस्सा लेते रहते थे। उन्हें गांव का सबसे युवा ग्रामप्रधान होने का भी तगमा हासिल हुआ।उसका बचपन का कुछ हिस्सा बेरीखाल में बीता  वह राज्य के वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार, समाजसेवी नसूया प्रसाद ‘ घायल’ के बाल  सखा रहे। वह निहायत अति गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता केशवराम रीठाखाल में दर्जी का पुश्तैनी पारम्परिक धंधा करते थे। जब कैलाश मात्र नौ साल के थे तो पिता का साया  उनके सिर से उठ गया था।  वह दो भाई एक बहिन थे। उनके  छोटे भाई का 6 निधन  साल पहले शुगर से हो गया। उनके  दीदी और जीजा की भी अकाल मौत के शिकार हुए थे। कैलाश  एक उम्दा कलाकार थे।  कैलाश के पूर्वज गोर्ला ठकुराई वीरबाला तीलू रौतेली के राज दरबार में चारण भाट भट्ट थे , जिन्हें द्वारपाल  कहा जाता है, जो ठाकुर रज्जा के आने की सूचना महल के द्वार से देते थे ।  कैलाश ने गढ़वाल के पारम्परिक परिधानों खासकर सिर की ताज टोपी पर सुन्दर और अविस्मरणीय काम किया। उत्तराखण्ड के महान गायक नरेंद्र सिंह नेगी नेगी ने भी कैलाश के निधन पर दुख जताया है उन्होंने अपने फ़ेसबुक  वाल पर लिखा है।

दगड्यों ब्याळी कैलाश भट्ट जी का निधन की खबर सुणीक् भौत दुःख ह्वै, भट्ट जी हमारा पारम्परिक, लोक परिधानों का सल्ली छा।
समय – समय कि बात च् दगड्यों भौत साल पैलि राजेन्द्र धसमाना जी जुकि दूरदर्शन म् सम्पादक छा ऊन एक टूपलि ( टोपी ) श्री नेगी जी थैं दे छै, नेगी जिन् ईं टूपलि का बारा म् कैलाश भट्ट जी थैं बताई अर बोलि कि आप ईं टूपलि थैं तैयार कैरा तब भट्ट जिल् व् टूपलि ( ज्व सबसे पैली तैयार ह्वै छै ) श्री नेगी जी अर हमारी सैरी टीम कू बणैं छै, आज भी हमारा मंचों म् भट्ट जी कि बणाई टूपलि अर परिधान अपणी प्रस्तुती देंदन।
भट्ट जी का दगड़ी हमन गीत ( होरि ऐगे, बरखा ) अर शार्ट फिल्म ( बोल दियां ऊंमा ) की शूटिंग भी करी छै जैमा आर्ट डाइरेक्टर की महत्वपूर्ण भूमिका म् भट्ट जिन् अपडू योगदान दे छौ।
आज उत्तराखण्ड का लोक परिधान कू सल्ली अर हमारी टीम को महत्वपूर्ण सदस्य हमन् खोई।
भगवान उंकी आत्मा थैं शांतिः दें अर ऊंका परिवार थैं ये दुःख सैणे शक्ति दें।
विनम्र श्रद्धांजलि, ॐ शांतिः।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *