प्रकृति ने कहीं का न छोड़ा
जनमंच टुडे/ ऊखीमठ।
इस बार केदार घाटी के हिमालयी क्षेत्रों में मौसम के अनुकूल बर्फबारी नहीं हुई और निचले क्षेत्रों में बारिश न होने से गेहूं की फसल चौपट हो गयी है, जिससे काश्तकारों के सन्मुख दो जून रोटी का संकट हो गया है। वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण की बीमारी के साथ – साथ यहाँ का काश्तकार प्रकृति की दोहरी मार झेलने को विवश हो गया है। गेहूं फसल के बुरी तरह प्रभावित होने से काश्तकारों को भविष्य की चिन्ता सताने लग गयी है। सीमान्त क्षेत्रों में भी जंगलों में पेड़ – पौधों के सूखने से मवेशियों के लिए चारापत्ती का संकट बना हुआ है। बता दे कि इस बार दिसम्बर, जनवरी, फरवरी माह में मौसम के अनुकूल हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं हुई और नही निचले क्षेत्रों में बारिश हुई जिससे पालक, राई की सहित अन्य सब्जियों की फसल चौपट हो गई थी।

फ्यूली व बुरासं भी अपने निधारित समय से डेढ़ माह पूर्व खिलने से काश्तकारों के साथ पर्यावरणविदों की चिन्ताये बढती जा रही थी। इस वर्ष मौसम के अनुकूल बर्फबारी व बारिश न होने से काश्तकारों की गेहूं, जौ, सरसों की फसलें खासी प्रभावित हुई है! काश्तकारों की माने तो मौसम के अनुकूल बर्फबारी व बारिश न होने से गेहूं, जौ, सरसों के उत्पादन पर खासा असर देखने को मिला है जिससे काश्तकारों के सन्मुख दो जून रोटी का संकट खड़ा होने के साथ ही भविष्य की चिंता सताने लगा गयी है। काश्तकारों के अनुसार इस वर्ष मौसम के अनुकूल बर्फबारी व बारिश न होने से गेहूं, जौ, सरसों की फसलों के उत्पादन पर 70 प्रतिशत तक गिरावट आई है ।

काश्तकार गजपाल भटट् ने बताया कि विगत वर्षों तक गेहूं के उत्पादन से लगभग 8 माह तक का गुजारा हो जाता, मगर इस बार गेहूं की फसल के उत्पादन पर भारी गिरावट आने से मात्र दो माह के गुजर बसर करने के लिए गेहूं नसीब हो पाया है। काश्तकार उत्तम सेमवाल ने बताया कि जब गेहूं की फसल को बारिश की जरूरत थी तब बारिश हुई नहीं अप्रैल माह के तीसरे सप्ताह में होने वाली बारिश ने गेहूं की शेष फसल भी प्रभावित हुई है जिससे काश्तकारों के सन्मुख दो जून रोटी का संकट खड़ा हो गया है। काश्तकार महेश नेगी ने बताया कि गेहूं के उत्पादन में भारी गिरावट आने से यहाँ का काश्तकार वैश्विक महामारी कोरोना संक्रमण की बीमारी के साथ प्रकृति की दोहरी मार झेलने को विवश बना हुआ है।
- लक्ष्मण सिंह नेगी,वरिष्ठ पत्रकार।
