प्रकृति एवं स्वास्थ्य को समर्पित घी त्यार
जनमंच टुडे/ डेस्क। देवभूमि उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक विरासत और लोकपर्वों के लिए पूरी दुनिया में अपनी अलग ही पहचान रखता है। देवभूमि ने सदियों से चले आ रहे तीज त्योहार , मेले, थोलो और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजों कर रखा है और उन्हें आज भी धूमधाम से मनाया जाता हैं। इन्हीं में से प्रकृति एवं स्वास्थ्य को समर्पित एक लोकपर्व है घी संक्रांति। जिसे घी त्यार (घी संक्रात) भी कहा जाता है। यह लोक पर्व उत्तराखण्ड के साथ ही पड़ोसी देश नेपाल में प्रत्येक वर्ष भाद्रपद (भादौ) माह की सिंह संक्रांति के दिन धूमधाम से मनाया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार इस दिन घी खाना जरूरी माना जाता है। कहते हैं कि जो इस दिन घी नही खाता उसे अगले जन्म में घोंघा( गड़ियाल) के रूप में जन्म लेना पड़ता है। घी त्यार के दिन घी से बने पकवान बनाये जाते हैं। इस दिन सबके सिर में घी रखते हैं। बुजुर्ग ‘जी रया जागी रया’ के आशीर्वाद के साथ छोटे बच्चों के सिर में घी रखते हैं। ज्योतिष मान्यता के अनुसार घी त्यार के दिन घी खाने से राहु-केतु का अशुभ प्रभाव नहीं पड़ता है। वहीँ आयुर्वेद के अनुसार घी को शरीर में लगाने से, बरसाती बीमारियों से त्वचा की रक्षा होती है। सिर में घी रखने से सिर की खुश्की नहीं होती है जिससे मनुष्य को चिंताओ और व्यथाओं से मुक्ति मिलती है और बुद्धि तेज़ होती है। घी खाने से कफ ,पित्त दोष दूर होते है और शरीर बलिष्ठ होता है। इसलिए घी त्यार मनाया जाता है और घी खाया जाता है । यह त्योहार उत्तराखण्ड और पड़ोसी नेपाल में सदियों से मनाया जाता है। घी संक्रांति या घी त्यार के दिन दूध दही, फल सब्जियों के उपहार एक दूसरे को बाटे जाने की परम्परा चंद राजाओं के समय से चली आ रही है। इसे ओलग परम्परा कहा जाता है। इसीलिए इसे ओलगिया , ओगी त्यार भी कहा जाता है। यह परम्परा उस समय भूमिहीनों को और शासन और समाज मे वरिष्ठ लोगों को उपहार दिए जाते थे। इन उपहारों में काठ के बर्तन ( स्थानीय भाषा मे ठेकी ) में दही या दूध और अरबी के पत्ते और मौसमी सब्जी और फल दिये जाते थे। अंग्रेजी शासन काल में बड़े दिन की डाली के रूप में दी जाने वाली भेंट के सामान ,एक ठेकी दही ,मुट्ठीभर गाबा ( अरबी की कोपलें ) भुट्टे खीरे आदि दिए जाते थे। बड़े दिन का उपहार भाद्रपद के इस दिन नियत किया गया था। क्युकी इस दिन या इस महीने उपहार के सारे सामान आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। यही परम्परा आज भी चली आ रही है।
