बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक ‘ फूलदेई’
जनमंच टुडे। देहरादून। चैत्र माह के आगमन पर संस्कृति, उत्साह , समृद्धि और प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक फूलदेई (फूल संक्रांति) प्रदेश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस त्योहार में घरों और मंदिरों के द्वार पर फूल रखे जाते हैं और लोकगीत गाकर खुशहाली और समृद्धि की कामना की जाती है। त्योहार की शुरुआत बच्चे करते हैं,जबकी बुजुर्ग समापन करते हैं। कुमाऊं , गढ़वाल में इसे फूलदेई और जौनसार में गोगा के नाम से जाना जाता है। यह त्योहार गढ़वाल और कुमाऊं में आठ दिनों तक मनाया जाता है। कुछ स्थानों पर इसे फुलारी महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। गांवों में फूलदेई त्योहार के आठवें दिन घरों में उगाई गयी जौ की बालियां प्राकृतिक जल स्रोतों पर विसर्जित करके फूलदेई त्योहार को मनाने की परम्परा है । फूलदेई त्योहार को चैत्र मास की संक्रांति से मनाने की परम्परा प्राचीन है। सभी गांवों में चैत्र माह की संक्रांति से नौनिहालों द्वारा फूलदेई त्योहार बडे़ उत्साह व उमंग से मनाया जाता है। फुलारी नौनिहालों द्वारा प्रति दिन ब्रह्म बेला पर घरों की चौखट में अनेक प्रजाति के पुष्प बिखेर कर बसन्त आगमन का सन्देश दिया जाता है और फुलारियो के नगर भ्रमण में घोघा नृत्य मुख्य आकर्षण रहता है। फाल्गुन माह की मासान्त को नौनिहालों द्वारा सूर्य छिपने के बाद खेत – खलिहानों से फ्यूली सहित अनेक प्रजाति के पुष्पों को रिंगाल की टोकरी में एकत्रित किया जाता है एवं रात्रि में पुष्पों को खुले आसमान में रखा जाता है। टोकरी में एकत्रित पुष्पों को बन्द कमरे में रखने पर पुष्प जूठे माने जाते हैं। फुलारी नौनिहाल घरों की चौखट में पुष्प बिखेरते समय अनेक प्रकार के गीत गाकर फूलदेई त्योहार की महिमा का गुणगान करते है । त्योहार के आठवें दिन नौनिहाल ब्रह्म बेला पर घरों की चौखट में अनेक प्रजाति के पुष्प बिखेर कर मांगल गीतों गाते हैं और दाल ,चावल मांगते हैं। ग्रामीणों द्वारा दिये गये दाल चावल से सामूहिक भोज का आयोजन किया गया है, साथ ही घोघा की विशेष पूजा – अर्चना कर घोघा को एक वर्ष के लिए धार्मिक स्थल या फिर प्राकृतिक जल स्रोत के निकट विसर्जित किया जाता है। फूलदेई त्योहार मनाने के पीछे एक कथा जुड़ी हुई है पौराणिक कथा के अनुसार सदियों पहले पहाड़ों में घोघाजीत नामक राजा रहता था। राजा की एक पुत्री थी जिसका नाम था घोघा। वह प्रकृति प्रेमी थी। एक दिन अचानक घोघा लापता हो गई। जिसके बाद राजा घोघाजीत उदास रहने लगा। एक रात कुलदेवी ने राजा को सपने में दर्शन दिया और गांवभर के बच्चों को वसंत चैत्र की अष्टमी पर बुलाने और उनसे से फ्योंली और बुरांस के फूलों को घर के देहरी पर रखवाने के आदेश दिया ताकि महल के साथ ही राज्य में खुशहाली आ सके। राजा ने कुलदेवी के आदेश पर ऐसा ही किया। जिसके बाद महल और गांव में खुशहाली लौट आई। इसके बाद से हर वर्ष फूलदेई मनाने की परम्परा शुरु हुई। वही राणों की मान्यता के अनुसार एक बार भगवान शिव तपस्या में लीन हो गये आवर वर्षों तक उनकी तपस्या तंत्र नहीं टूटी तो पार्वती ने शिव की तपस्या भंग करने के लिए कैंणी में फ्योली के पीले फूल खिलने के कारण सभी शिव गणों को पीताम्बरी जामा पहनाया और उन्हें अबोध बच्चे बनाकर उन्हें देवक्यारियों से ऐसे पुष्प लाने को कहा जिनकी खुशबू से कैलाश महक उठे। पार्वती के आदेश पर शिवगणों ने सुगन्धित पुष्प एकत्रित किए और शिवजी की तपस्या भंग करने के लिए कैलाश पहुंच गए और शिवजी को सुगन्धित फूल चढ़ाए , फूलों की सुगन्ध से महादेव की तपस्या भंग हो गई। इसके बाद सभी बालरूपी गण फुलदेई क्षमा देई, भर भंकार तेरे द्वार आए महाराज बोलकर क्षमा मांगने लगे। बच्चों को देखकर शिव का गुस्सा शांत हो गया और वह भी बच्चों संग इस उत्सव में शामिल हो गए। कहा जाता है कि तभी से फूल पर्व यानि की फूलदेई का त्योहार मनाने की परंपरा शुरू हुई
