इस स्थान पर गिरा था माता सती का सिर

जनमंच टुडे। देहरादून। देवभूमि में अनादिकाल से नारी शक्ति की पूजा की जाती है और नारी का सम्मान यहां की सर्वोच्च परंपरा है। देवभूमि में अनेक देवी,देवताओं के सैकड़ों मन्दिर विराजमान हैं जो सदियों से लोगों के आस्था के केंद्र हैं। इनमें से एक है। नई टिहरी के जौनपुर ब्लाक के सुरकुट पर्वत पर घने जंगलों के बीच स्थित माता सुरकंडा देवी का मंदिर हैं। यह मंदिर माता दुर्गा के नौ रुपों को समर्पित है और 52 शक्ति पीठों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार जब राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ का आयोजन किया था और भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। शिव के मना करने के बावजूद माता सती यज्ञ में शामिल होने  कनखल चली गईं। जहां राजा दक्ष ने  सती और मेहमानों के सामने शिव का अपमान किया,लेकिन सती शिव का अपमान सहन नहीं कर सकी और वह यज्ञ कुंड में कूद गईं। सती की यज्ञ कुड़ में कूदने की जानकारी शिव को मिली तो वह रौद्र रूप में आ गए और यज्ञ स्थल पहुंच कर राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया इसके बाद उन्होंने माता सती का शव कुंड से निकाला और उसे त्रिशूल में टांगकर आकाश में वियोग मेंं भटकने लगे। शिव के वियोग से सृष्टि में ठहराव आ गया। शिव की व्यथा को देखकर भगवान विष्णु ने चक्र से माता सती के मृत शरीर को खंडित करने का निर्णय लिया और माता के शरीर को 52 टुकड़ों में खंडित कर दिया। इस पर माता सती का सिर सुरकुट पर्वत पर गिरा। तभी से ये स्थान सुरकंडा देवी सिधपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। केदारखण्ड व स्कंद पुराण के अनुसार जब राजा इंद्र का  राजपाट छीन गया था तो, उन्होंने सुरकुट पर्वत पर माता की आराधना की और माता के आशीर्वाद से अपना खोया हुआ साम्राज्य प्राप्त किया था। पौराणिक प्रचलित कथा के अनुसार चंबा जड़धार गाँव के युवक को यहाँ माता ने बूढ़ी महिला के रूप में  दर्शन दिए थे। यह भी मान्यता है कि दशकों पहले एक बूढ़ी औरत बुरांसखंडा से सुरकुंडा की ओर जा रही थीं । थकान होने पर वह राह चलने वाले श्रद्धालुओं से  सुरकुट पर्वत तक पहुंचाने की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। आखिर में जड़धार गांव के एक युवक  ने  वृद्धा को कंडी में बिठाकर सुरकूट पर्वत तक पहुंचाया। इसके बाद उस बूढ़ी औरत ने युवक को  देवी रूप में दर्शन दिए और युवक से कहा तू मेरा मैती यानी मायके वाला है। कहा जाता है तभी से जड़धार गाँव के ग्रामीणों को माता के मैती वाले माना जाता है । सुरकंडा देवी की एक विशेषता यह है कि यहां भक्तों को प्रसाद के रूप में रौंसली की पत्तियां  दी जाती है जो औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन पत्तियों से घर में सुख समृद्धि आती है। क्षेत्र में इसे देववृक्ष माना जाता है। इसीलिए इस पेड़ की लकड़ी को इमारती या दूसरे व्यावसायिक उपयोग में नहीं लाया जाता है। यह एक मात्र ऐसा मन्दिर है, जहां से चारधाम की पर्वत श्रृंखलायें दिखाई देती हैं। सुरकुट  से  बद्रीनाथ, केदारनाथ, तुंगनाथ, गौरीशंकर, नीलकंठ आदि कई पर्वत श्रृंखलायें दिखाई देती हैं।  दक्षिण में देहरादून, हरिद्वार का मनमोहक दृश्य भी यहां से दिखाई देता है।  मन्दिर के कपाट साल भर खुले रहते हैं। नवराात्रि में यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ जुटती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *